कुरान - 9:62 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

62
يَحۡلِفُونَ بِٱللَّهِ لَكُمۡ لِيُرۡضُوكُمۡ وَٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥٓ أَحَقُّ أَن يُرۡضُوهُ إِن كَانُواْ مُؤۡمِنِينَ,

Transliteration: (Yahlifoona billaahi lakum liyurdookum wallaahu wa Rasooluhoo ahaqqu ai yurdoohu in kaanoo mu'mineen)

वे तुम्हें राज़ी करने के लिए तुम्हारे सामने अल्लाह की क़समें खाते हैं [174]। हालाँकि अल्लाह और उसका रसूल इसके ज़्यादा हक़दार हैं कि वे उसे राज़ी करें [175], अगर वे मोमिन हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 62 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 62 की तफ़्सीर

✅ [174] शान-ए-नुज़ूल

यह आयत उन मुनाफ़िक़ों के बारे में है जो पीठ पीछे इस्लाम और मुसलमानों का मज़ाक उड़ाते थे, लेकिन सामने आकर वफ़ादारी का दिखावा करते थे। जब सामना होता तो वे अल्लाह की झूठी क़समें खाकर बेगुनाही का दावा करते, ताकि मोमिनों को राज़ी कर सकें और अपनी इज़्ज़त बचा सकें।

ये क़समें सच्ची नहीं, बल्कि धोखे की चालें थीं, जिनका मक़सद मुस्लिम समाज में क़बूलियत बरक़रार रखना था। आयत उनके दोहरे चेहरे को उजागर करती है और ऐसे सतही दिखावे से मोमिनों को आगाह करती है।

✅ [175] अल्लाही हुक़ूक़ और सच्चा ईमान

इस आयत से हम दो अहम उसूल सीखते हैं:

  • इबादत के कामों में अगर इंसान की नियत में नबी करीम ﷺ को राज़ी करना भी शामिल हो, तो यह शिर्क नहीं, बल्कि ईमान की तकमील है। नबी ﷺ से सच्ची मोहब्बत ईमान का लाज़िमी हिस्सा है। नबी ﷺ की रज़ामंदी अल्लाह की रज़ा को दर्शाती है, क्योंकि वे सिर्फ़ वही पसंद करते हैं जो अल्लाह पसंद करता है।
  • क़ुर्बानी या हज जैसी इबादतें नबी ﷺ की ताज़ीम या उनकी शफ़ाअत के इरादे से करना रूहानी सवाब का ज़रिया है। नबी करीम ﷺ ने ख़ुद अपनी उम्मत की तरफ़ से क़ुर्बानी की, जो दर्शाता है कि उनकी रज़ा की तलाश अल्लाह की क़ुर्बत का रास्ता है। अल्लाह और उसके रसूल को राज़ी करना सच्चे मोमिनों की असल पहचान है।

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