Transliteration: (Alam ya'lamooo annahoo mai yuhaadidillaaha wa Rasoolahoo fa'anna lahoo Naara jahannama khaalidan feehaa; zaalikal khizyul 'Azeem)
इससे मुराद ख़ास तौर पर उन लोगों की है जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की खुले इनकार के साथ मुख़ालिफ़त करते हैं — यानी अल्लाह के अहकाम को झूठा या बातिल समझते हैं।
ऐसी मुख़ालिफ़त महज़ गुनाह या नाफ़रमानी नहीं, बल्कि कुफ़्र है। इसलिए जो गुनाहगार मुसलमान अल्लाह के हुक्मों की सच्चाई पर ईमान रखते हुए जानबूझकर उनकी ख़िलाफ़वर्ज़ी करते हैं, वे इस दायरे में शामिल नहीं। उनके काम गुनाह हैं, लेकिन खुला इनकार नहीं।
इनकार और ख़िलाफ़वर्ज़ी में यही फ़र्क़ अहम है: इनकार कुफ़्र है, जबकि ख़िलाफ़वर्ज़ी बड़ा गुनाह।
यह आयत साफ़ तौर पर साबित करती है कि हमेशा का अज़ाब काफ़िरों के लिए है।
गुनाहगार मोमिन हमेशा के लिए जहन्नम में नहीं रहेंगे; वे पाक होने के लिए अस्थायी तौर पर दाख़िल हो सकते हैं, जैसे नापाक सोना आग में तपाकर साफ़ होता है। इसके उलट काफ़िर उस कोयले जैसे हैं जो आग को भड़काता है। यह तस्वीर ईमान की बिना पर आख़िरी अंजाम का फ़र्क़ साफ़ करती है।
हम यह भी सीखते हैं कि नबी ﷺ के पैग़ाम की ज़रा सी मुख़ालिफ़त भी कुफ़्र है। इसलिए नबी ﷺ के किसी क़ौल या दीनी अमल को ठुकराना अल्लाह को ठुकराने के बराबर है — यह अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की इताअत के जुड़े होने को मज़बूत करता है।
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