Transliteration: (Wa minhumul lazeena yu'zoonan nabiyya wa yaqooloona huwa uzun; qul uzunu khairil lakum yu'minu billaahi wa yu'minu lil mu'mineena wa rahmatul lil lazeena aamanoo minkum; wallazeena yu'zoona Rasoolal laahi lahum 'azaabun 'aleem)
यह आयत उन मुनाफ़िक़ों के बारे में नाज़िल हुई जो अपनी निजी महफ़िलों में नबी करीम ﷺ का मज़ाक उड़ाते थे। वे बुरी बातें करते और समझते थे कि अगर यह बात आप तक पहुँच गई तो वे इनकार कर देंगे और झूठी क़समें खाएँगे, कहेंगे: "वह तो सिर्फ़ कान हैं" — यानी जो सुनते हैं उस पर यक़ीन कर लेते हैं।
जल्लास बिन सईद भी उनमें से था जो ऐसी बातें कहता था। उनका मतलब था कि नबी ﷺ बहुत भोले हैं। इसके जवाब में यह आयत साफ़ करती है कि नबी ﷺ सुनते तो हैं, लेकिन हिकमत से सुनते हैं, भोलेपन से नहीं। यह एलान उन लोगों के लिए सख़्त चेतावनी था जो आपके सब्र और नर्म मिज़ाज का ग़लत फ़ायदा उठाते थे।
इस इज़हार का मतलब है कि नबी ﷺ पाक दिल से सुनते हैं और वह भी तुम्हारे ही फ़ायदे के लिए। वे न तो तुम्हारी कमज़ोरियाँ उजागर करते हैं, न जल्दबाज़ी में फ़ैसला करते हैं।
अगर वे तुम्हारे राज़ खोल देते या हर बेअदबी का जवाब देते, तो मुनाफ़िक़ों की सख़्त रुसवाई होती। उनका सब्र और दरगुज़र उनके आला किरदार और अल्लाही रहमत को ज़ाहिर करता है।
पूरी इत्तला के बावजूद नुक़सान न पहुँचाना उनकी अज़मत की निशानी है।
हालाँकि नबी ﷺ सबकी सुनते हैं, वे सिर्फ़ मोमिनों की बातों पर भरोसा करते हैं। मुनाफ़िक़ों के सामने उनका ख़ामोश रहना जिहालत नहीं, बल्कि अल्लाही हिकमत है।
वे सुनते हैं, लेकिन दिल सिर्फ़ उसी को मानता है जो सच्चाई और ईमान के मुताबिक़ हो। उनका मामला शक पर नहीं, बल्कि साफ़ बसीरत पर होता है — बग़ैर सख़्त रवैया अपनाए वे हक़ और निफ़ाक़ में फ़र्क़ करते हैं।
नबी ﷺ सारी मख़लूक़ के लिए रहमत हैं, लेकिन यह आयत उनकी ख़ास रहमत को उजागर करती है जो सच्चे मोमिनों के लिए है।
यह उनके "रहमतुल-लिल-आलमीन" होने से टकराता नहीं, बल्कि इस बात पर ज़ोर देता है कि उनकी नरमी और मोहब्बत का गहरा असर उन पर होता है जो उन पर ईमान रखते हैं। उनकी हिदायत, शफ़ाअत और रहमत मोमिनों को बेशुमार रूहानी फ़ायदा पहुँचाती है।
"नबी को तकलीफ़ देना" से मुराद किसी भी क़िस्म का नुक़सान है — चाहे लफ़्ज़ों से, कामों से, इशारों से या रवैये से जो उन्हें दुखी करे। मुनाफ़िक़ बुहतान, नाफ़रमानी और मज़ाक से बार-बार इस गुनाह में मुब्तला थे।
यहाँ तक कि उनकी इज़्ज़त की बेअदबी करने वाली कोई बारीक बात भी इसी ज़ुमरे में आती है। इससे नबी ﷺ के मुक़ाम की हुरमत और उन्हें किसी भी सूरत में दुख पहुँचाने के सख़्त गुनाह का अंदाज़ा होता है।
इस आयत से दो बड़े फ़िक़्ही उसूल निकलते हैं:
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat