Transliteration: (Laa ta'taziroo qad kafartum ba'da eemaanikum; in na'fu 'an taaa'ifatin minkum nu'az zib taaa'ifatan bi annahum kaanoo mujrimeen)
यह आयत साफ़ एलान है कि नबी करीम ﷺ की शान का मज़ाक उड़ाना या बेअदबी करना — चाहे मज़ाक में या बग़ैर बराह-ए-रास्त इरादे के — कुफ़्र है। अल्लाह ने उनके "महज़ मज़ाक" वाले बहाने क़बूल नहीं किए।
इसलिए हम सीखते हैं कि नबी ﷺ का मज़ाक उड़ाना इंसान का ईमान ख़त्म कर देता है और उसे मुर्तद बना देता है। यह हुक्म साफ़ लकीर खींचता है: नबी ﷺ की ताज़ीम इस्लामी ईमान का लाज़िमी और ना-क़ाबिल-ए-समझौता हिस्सा है।
आयत का यह हिस्सा इस वाक़ये में शामिल तीन मुनाफ़िक़ों के अंजाम की तरफ़ इशारा करता है। क्लासिकल तफ़्सीर के मुताबिक़ उनमें से एक — यहया बिन हमीर अशजई — ने सच्ची तौबा की। उसकी तौबा क़बूल हुई, जबकि बाक़ी दोनों को यह मौक़ा नहीं मिला और वे अपनी जारी गुनाहगारी और हठ की वजह से सज़ा के मुस्तहिक़ ठहरे।
यहया बिन हमीर बाद में सच्चे मुसलमानों में शामिल हुआ और हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ (रज़ि.) के दौरे-ख़िलाफ़त में ग़ज़वा-ए-यमामा में शहीद हुआ। हैरत की बात यह है कि जंग के बाद उसका जिस्म नहीं मिला। शहादत से पहले उसने दिल से दुआ की थी: "ऐ अल्लाह! मुझे ऐसी शहादत अता फ़रमा कि कोई मेरा ग़ुस्ल दे, कफ़न दे या मुझे दफ़नाए।" उसकी दुआ क़बूल हुई और उसे नेक, छिपी हुई शहादत नसीब हुई।
इससे हम समझते हैं कि सच्ची तौबा सबसे बड़े गुनाहों को भी मिटा सकती है। अल्लाह हमें भी ऐसे तौबा करने वाले बंदों के तरीक़े पर तौबा और माफ़ी की तौफ़ीक़ अता करे। आमीन।
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