कुरान - 9:67 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

67
ٱلۡمُنَٰفِقُونَ وَٱلۡمُنَٰفِقَٰتُ بَعۡضُهُم مِّنۢ بَعۡضٖۚ يَأۡمُرُونَ بِٱلۡمُنكَرِ وَيَنۡهَوۡنَ عَنِ ٱلۡمَعۡرُوفِ وَيَقۡبِضُونَ أَيۡدِيَهُمۡۚ نَسُواْ ٱللَّهَ فَنَسِيَهُمۡۚ إِنَّ ٱلۡمُنَٰفِقِينَ هُمُ ٱلۡفَٰسِقُونَ,

Transliteration: (Almunaafiqoona wal munaafiqaatu ba'duhum mim ba'd; yaamuroona bilmunkari wa yanhawna 'anil ma'roofi wa yaqbidoona aidiyahum; nasul laaha fanasiyahum; innal munaafiqeena humul faasiqoon)

मुनाफ़िक़ मर्द और मुनाफ़िक़ औरतें सब एक जैसे हैं [184]। वे बुराई का हुक्म देते हैं और भलाई से रोकते हैं [185], और अपने हाथ बंद रखते हैं [186]। उन्होंने अल्लाह को भुला दिया, तो अल्लाह ने भी उन्हें भुला दिया। बेशक मुनाफ़िक़ ही फ़ासिक़ (नाफ़रमान) हैं [187]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 67 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 67 की तफ़्सीर

✅ [184] निफ़ाक़ में बराबरी

यह आयत ज़ोर देती है कि मुनाफ़िक़ मर्द और औरतों में एक जैसी ख़ासियतें और अंजाम हैं — उनके निफ़ाक़ में कोई फ़र्क़ नहीं।

चाहे वे लीडर हों या पैरोकार, सब सच्चे ईमान से बराबर महरूम हैं और निफ़ाक़ के दायरे में हैं। ज़ाहिरी दावों या हैसियत के बावजूद उनमें से कोई सच्चा मोमिन नहीं।

✅ [185] बुराई का हुक्म और भलाई से रोकना

मुनाफ़िक़ बुराई को बढ़ावा देते हैं और नेक रवैये से रोकते हैं। लोगों को नेक कामों और अच्छे अमल से रोकना उनके रवैये की पहचान है।

यह उन लोगों के लिए याददिहानी है जो नेक रूहानी सरगर्मियों — जैसे अल्लाह का ज़िक्र, औलिया की महफ़िलें या दूसरे ईमानी काम — से रोकते हैं, कि ऐसी रुकावट नेकी की राह के ख़िलाफ़ है। आयत उन गिरोहों को चेतावनी देती है जो सामूहिक इबादत या नेक कामों में रुकावट डालते हैं।

✅ [186] हाथ बंद रखना और ख़र्च से रोकना

मुनाफ़िक़ न अल्लाह की राह में अपना माल ख़र्च करते हैं, न दूसरों को खुलकर ख़र्च करने देते हैं। उनकी कंजूसी सिर्फ़ अपने ख़र्च तक नहीं, बल्कि दूसरों के नेक ख़र्चों में रुकावट डालने तक फैली है।

इसमें नेक इज्तिमाअत या दीनी तक़रीबों — जैसे अल्लाह के नेक बंदों की फ़ातिहा — से रोकना भी शामिल है। ऐसा रवैया सच्ची सख़ावत और इबादत का इनकार है।

✅ [187] हठीले नाफ़रमान

हालाँकि मुनाफ़िक़ ज़ाहिरी तौर पर इस्लाम का दावा करते हैं, वे अंदर से गुनाहगार और सरकश हैं। आयत उन्हें "हठीले नाफ़रमान" इसलिए कहती है क्योंकि वे लगातार बुरे कामों पर अड़े हैं और सच्चे ईमान से इनकार करते हैं।

गुनाह की क़िस्मों में कुफ़्र और निफ़ाक़ सबसे गंभीर हैं, जो सच्चे ईमान और इताअत के बिलकुल उलट हैं।

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