कुरान - 9:68 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

68
وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلۡمُنَٰفِقِينَ وَٱلۡمُنَٰفِقَٰتِ وَٱلۡكُفَّارَ نَارَ جَهَنَّمَ خَٰلِدِينَ فِيهَاۚ هِيَ حَسۡبُهُمۡۚ وَلَعَنَهُمُ ٱللَّهُۖ وَلَهُمۡ عَذَابٞ مُّقِيمٞ,

Transliteration: (Wa'adal laahul munafiqeena wal munaafiqaati wal kuffaara naara jahannnamma khaalideena feehaa; hiya hasbuhum; wa la'annahumul laahu wa lahum 'azaabum muqeem)

अल्लाह ने मुनाफ़िक़ मर्दों और मुनाफ़िक़ औरतों और काफ़िरों से जहन्नम की आग का वादा किया है, जिसमें वे हमेशा रहेंगे। वही उनके लिए काफ़ी है। और उन पर अल्लाह की लानत है, और उनके लिए दाइमी अज़ाब है [188]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 68 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 68 की तफ़्सीर

✅ [188] मुनाफ़िक़ों और काफ़िरों के लिए अल्लाही अज़ाब

यह आयत साफ़ बताती है कि अल्लाह का हमेशा के लिए जहन्नम की आग का वादा मुनाफ़िक़ मर्दों, मुनाफ़िक़ औरतों और खुले काफ़िरों — सब पर बराबर लागू है।

उनका अंजाम उनके इनकार और निफ़ाक़ की वजह से मुहर्र हो चुका है, और यह चेतावनी अकेले ही बुराई से रोकने के लिए काफ़ी होनी चाहिए। उन पर अल्लाह की लानत है, जो उनकी सज़ा की शिद्दत और दावाम पर ज़ोर देती है।

यहाँ एक अहम बात: शरीअत में मुनाफ़िक़ों का हुक्म काफ़िरों से अलग है, क्योंकि शरीअत के फ़ैसले ज़ाहिरी आमाल पर मबनी होते हैं। इसलिए मुनाफ़िक़ों के ख़िलाफ़ खुले काफ़िरों जैसी जंग का एलान नहीं होता, क्योंकि निफ़ाक़ का ताल्लुक़ अंदरूनी ईमान और छिपाव से है, खुली दुश्मनी से नहीं।

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