Transliteration: (Alam ya'tihim naba ul lazeena min qablihim qawmi Noohinw wa 'Aadinw wa Samooda wa qawmi Ibraaheema wa ashaabi Madyana wal mu'tafikaat; atathum Rusuluhum bilbaiyinaati famaa kaanal laahu liyazlimahum wa laakin kaanooo anfusahum yazlimoon)
इससे हम सीखते हैं कि सबक़ लेने की ग़रज़ से सच्ची तारीख़ का मुताला करना बेहतरीन इबादत है। कुरआन ने नेक लोगों और काफ़िरों के सच्चे वाक़यात इसी लिए बयान किए हैं।
यही वजह थी कि नेक औलिया के उर्स और मीलाद शरीफ़ मनाने का इंतज़ाम किया गया, ताकि मुसलमान नबी ﷺ और इन नेक बंदों की मुबारक ज़िंदगी से वाक़िफ़ हों और अपने आक़ीदों की इस्लाह करें।
इससे मुराद नमरूद और उसके पैरोकार हैं, जो अपनी बेपनाह ताक़त के बावजूद सिर्फ़ एक पत्थर से हलाक कर दिए गए।
अल्लाह की ताक़त ऐसी है कि वह हाथियों को छोटे से अबाबील (निगल जैसे) परिंदों से हलाक कर सकता है।
इससे मुराद हज़रत लूत (अलै.) की क़ौम की पाँच बस्तियाँ हैं। सदूम और उसके आसपास के गाँव इस तरह उलट दिए गए कि ऊपर का हिस्सा नीचे और नीचे का हिस्सा ऊपर हो गया। अल्लाह फ़रमाता है: "हमने उस बस्ती को उलट दिया" (सूरा हूद 11:82)।
आद, समूद और लूत की क़ौमों की ये बस्तियाँ अरब वालों को उनके सफ़रों के रास्ते में मिलती थीं। उनके खंडहर मुसाफ़िरों को देखने और ग़ौर करने के लिए मौजूद थे, लेकिन वे अपने आसपास से बेख़बर रहे। इसलिए उन्हें हुक्म दिया गया कि वे जो कुछ देखते हैं उस पर ग़ौर करें और सबक़ लें।
"अल्लाह पर यह नाज़िब नहीं" से मुराद यह है कि बग़ैर किसी गुनाह के सज़ा देना, या उनके गुनाहों से ज़्यादा सज़ा देना अल्लाह की शान नहीं।
याद रहे: ज़ुल्म का मतलब है किसी दूसरे की चीज़ उसकी इजाज़त के बग़ैर इस्तेमाल करना। यह परिभाषा अल्लाह पर लागू नहीं होती, क्योंकि दुनिया की हर चीज़ उसी की है। इसलिए ज़ुल्म की इस परिभाषा के मुताबिक़ अल्लाह उससे पाक है।
हर काफ़िर ज़ालिम है, क्योंकि वह अल्लाह की नेमतों का बग़ैर हक़ इस्तेमाल करता है, जबकि उसे यह अहसास नहीं होता कि वह ख़ुद, उसकी औलाद और उसका माल — सब अल्लाह का है।
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