कुरान - 9:70 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

70
أَلَمۡ يَأۡتِهِمۡ نَبَأُ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡ قَوۡمِ نُوحٖ وَعَادٖ وَثَمُودَ وَقَوۡمِ إِبۡرَٰهِيمَ وَأَصۡحَٰبِ مَدۡيَنَ وَٱلۡمُؤۡتَفِكَٰتِۚ أَتَتۡهُمۡ رُسُلُهُم بِٱلۡبَيِّنَٰتِۖ فَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيَظۡلِمَهُمۡ وَلَٰكِن كَانُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ يَظۡلِمُونَ,

Transliteration: (Alam ya'tihim naba ul lazeena min qablihim qawmi Noohinw wa 'Aadinw wa Samooda wa qawmi Ibraaheema wa ashaabi Madyana wal mu'tafikaat; atathum Rusuluhum bilbaiyinaati famaa kaanal laahu liyazlimahum wa laakin kaanooo anfusahum yazlimoon)

क्या उन्हें उन लोगों की ख़बर नहीं पहुँची [192] जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं — नूह की क़ौम, और आद, और समूद, और इब्राहीम की क़ौम [193], और मदयन वालों, और उलट दी गई बस्तियों [194] की? उनके पास उनके रसूल साफ़ निशानियाँ लेकर आए थे। तो अल्लाह उन पर ज़ुल्म नहीं करने वाला था [195], लेकिन वे ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म करते रहे [196]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 70 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 70 की तफ़्सीर

✅ [192] सच्ची तारीख़ से सबक़ लेना

इससे हम सीखते हैं कि सबक़ लेने की ग़रज़ से सच्ची तारीख़ का मुताला करना बेहतरीन इबादत है। कुरआन ने नेक लोगों और काफ़िरों के सच्चे वाक़यात इसी लिए बयान किए हैं।

यही वजह थी कि नेक औलिया के उर्स और मीलाद शरीफ़ मनाने का इंतज़ाम किया गया, ताकि मुसलमान नबी ﷺ और इन नेक बंदों की मुबारक ज़िंदगी से वाक़िफ़ हों और अपने आक़ीदों की इस्लाह करें।

✅ [193] अपनी ताक़त के बावजूद हलाक होने वाले लोग

इससे मुराद नमरूद और उसके पैरोकार हैं, जो अपनी बेपनाह ताक़त के बावजूद सिर्फ़ एक पत्थर से हलाक कर दिए गए।

अल्लाह की ताक़त ऐसी है कि वह हाथियों को छोटे से अबाबील (निगल जैसे) परिंदों से हलाक कर सकता है।

✅ [194] क़ौम-ए-लूत की उलटी हुई बस्तियाँ

इससे मुराद हज़रत लूत (अलै.) की क़ौम की पाँच बस्तियाँ हैं। सदूम और उसके आसपास के गाँव इस तरह उलट दिए गए कि ऊपर का हिस्सा नीचे और नीचे का हिस्सा ऊपर हो गया। अल्लाह फ़रमाता है: "हमने उस बस्ती को उलट दिया" (सूरा हूद 11:82)।

आद, समूद और लूत की क़ौमों की ये बस्तियाँ अरब वालों को उनके सफ़रों के रास्ते में मिलती थीं। उनके खंडहर मुसाफ़िरों को देखने और ग़ौर करने के लिए मौजूद थे, लेकिन वे अपने आसपास से बेख़बर रहे। इसलिए उन्हें हुक्म दिया गया कि वे जो कुछ देखते हैं उस पर ग़ौर करें और सबक़ लें।

✅ [195] अल्लाह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता

"अल्लाह पर यह नाज़िब नहीं" से मुराद यह है कि बग़ैर किसी गुनाह के सज़ा देना, या उनके गुनाहों से ज़्यादा सज़ा देना अल्लाह की शान नहीं।

याद रहे: ज़ुल्म का मतलब है किसी दूसरे की चीज़ उसकी इजाज़त के बग़ैर इस्तेमाल करना। यह परिभाषा अल्लाह पर लागू नहीं होती, क्योंकि दुनिया की हर चीज़ उसी की है। इसलिए ज़ुल्म की इस परिभाषा के मुताबिक़ अल्लाह उससे पाक है।

✅ [196] काफ़िरों का अपने ऊपर ज़ुल्म

हर काफ़िर ज़ालिम है, क्योंकि वह अल्लाह की नेमतों का बग़ैर हक़ इस्तेमाल करता है, जबकि उसे यह अहसास नहीं होता कि वह ख़ुद, उसकी औलाद और उसका माल — सब अल्लाह का है।

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