कुरान - 9:71 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

71
وَٱلۡمُؤۡمِنُونَ وَٱلۡمُؤۡمِنَٰتُ بَعۡضُهُمۡ أَوۡلِيَآءُ بَعۡضٖۚ يَأۡمُرُونَ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَيَنۡهَوۡنَ عَنِ ٱلۡمُنكَرِ وَيُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤۡتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَيُطِيعُونَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥٓۚ أُوْلَـٰٓئِكَ سَيَرۡحَمُهُمُ ٱللَّهُۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٞ,

Transliteration: (Wal mu'minoona wal mu'minaatu ba'duhum awliyaaa'u ba'd; ya'muroona bilma'roofi wa yanhawna 'anil munkari wa yuqeemoonas Salaata wa yu'toonaz Zakaata wa yutee'oonal laaha wa Rasoolah; ulaaa'ika sayarhamu humul laah; innallaaha 'Azeezun Hakeem)

और मोमिन मर्द और मोमिन औरतें आपस में एक-दूसरे के मददगार हैं [197]। वे भलाई का हुक्म देते हैं और बुराई से रोकते हैं, नमाज़ क़ायम करते हैं, ज़कात देते हैं और अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करते हैं। यही वे लोग हैं जिन पर अल्लाह रहम [198] करेगा। बेशक अल्लाह ज़बरदस्त, हिकमत वाला है [199]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 71 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 71 की तफ़्सीर

✅ [197] मुसलमानों में भाईचारा और दोस्ती

इससे हम सीखते हैं कि मुसलमान आपस में दोस्त और एक-दूसरे के हिमायती हैं।

जहाँ अल्लाह फ़रमाता है: "तो अल्लाह के मुक़ाबले में न तो तुम्हारा कोई हिमायती होगा और न मददगार" (सूरा बक़रा 2:120) — इसका मतलब यह है कि अल्लाह की मुख़ालिफ़त में तुम्हारा कोई दोस्त या मददगार नहीं। इसलिए अल्लाह के सिवा दोस्त, अल्लाह के दोस्तों से अलग है।

यह भी याद रहे: मोमिनों की यह दोस्ती मौत के बाद ख़त्म नहीं होती, बल्कि जारी रहती है।

✅ [198] मोमिनों पर अल्लाह की रहमत

अल्लाह मोमिनों पर इन तरीक़ों से रहम करता है:

  • दुनिया में उन्हें शैतान के दाँव से बचाता है।
  • मौत के वक़्त उनके ईमान की हिफ़ाज़त करता है।
  • उनकी क़ब्रों में नूर डालता है और सवाल-जवाब आसान करता है।
  • रोज़-ए-जज़ा उनका आमालनामा दाएँ हाथ में देता है।
  • तराज़ू पर उनके नेक आमाल को गुनाहों से भारी करता है।
  • क़ियामत की हिसाब-किताब उनके लिए आसान करता है।

रिवायात के मुताबिक़ ये पाँच नेमतें पाँच वक़्त की नमाज़ की वजह से मिलती हैं। (रूहुल बयान)

✅ [199] अल्लाह की सल्तनत और हिकमत

अल्लाह जिसे देता है, उससे कोई नहीं छीन सकता, और जिसे नहीं देता, उसे कोई नहीं दे सकता। नबी और औलिया अल्लाह से दुआ करते हैं ताकि वह उनके मुरीदों को अता करे।

अल्लाह की मुख़ालिफ़त में कोई कुछ नहीं कर सकता।

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