Transliteration: (Kallazeena min qablikum kaanoo ashadda minkum quwwatanw wa aksara amwaalanw wa awlaadan fastamta'oo bikhalaaqihim fastamta'tum bikhalaaqikum kamas tamta'al lazeena min qablikum bikhalaa qihim wa khudtum kallazee khaadooo; ulaaa'ika habitat a'maaluhum fid dunyaa wal Aakhirati wa ulaaa'ika humul khaasiroon)
यह आयत नबी ﷺ से पहले की ताक़तवर क़ौमों की तरफ़ इशारा करती है, जैसे आद और समूद की क़ौमें, जो बेहद ताक़तवर थीं।
इस ताक़त के बावजूद, जब उन्होंने अल्लाह के किसी नबी की मुख़ालिफ़त की, तो वे हलाक कर दिए गए। इसलिए ऐ मुनाफ़िक़ों! अपने अंजाम से ख़बरदार रहो।
इससे हम सीखते हैं कि माद्दी ताक़त हमेशा रूहानी ताक़त से शिकस्त खाती है। ग़ौर कीजिए: हज़रत मूसा (अलै.) ने अकेले सत्तर हज़ार जादूगरों को शिकस्त दी। दुनिया की पूरी ताक़तें न सिर्फ़ नबी के आगे, बल्कि एक वली (नबी के नायब) के आगे भी नाकाम रहती हैं।
इससे हम दो बातें सीखते हैं:
नेक आमाल इंसान को दुनिया में फ़ायदा पहुँचाते हैं — आफ़तों से बचाते हैं, माल बढ़ाते हैं और हर इज़्ज़त देते हैं। अल्लाह फ़रमाता है: "और जो अल्लाह से डरे, अल्लाह उसके लिए निकलने का रास्ता बना देगा, और उसे वहाँ से रोज़ी देगा जहाँ से उसे ख़याल भी न हो" (सूरा तलाक़ 65:2-3)। आख़िरत में भी यही आमाल उसके नजात दहिंदे होंगे, जिनसे उसे अल्लाह की नेमतें मिलेंगी।
इसके उलट, नेकी काफ़िर को न दुनिया में नफ़ा देती है न आख़िरत में। इससे हम सीखते हैं कि काफ़िरों की दुआएँ, दम (झाड़-फूँक) और तावीज़ न सिर्फ़ बेफ़ायदा हैं, बल्कि बेकार हैं।
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