कुरान - 9:69 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

69
كَٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ كَانُوٓاْ أَشَدَّ مِنكُمۡ قُوَّةٗ وَأَكۡثَرَ أَمۡوَٰلٗا وَأَوۡلَٰدٗا فَٱسۡتَمۡتَعُواْ بِخَلَٰقِهِمۡ فَٱسۡتَمۡتَعۡتُم بِخَلَٰقِكُمۡ كَمَا ٱسۡتَمۡتَعَ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُم بِخَلَٰقِهِمۡ وَخُضۡتُمۡ كَٱلَّذِي خَاضُوٓاْۚ أُوْلَـٰٓئِكَ حَبِطَتۡ أَعۡمَٰلُهُمۡ فِي ٱلدُّنۡيَا وَٱلۡأٓخِرَةِۖ وَأُوْلَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡخَٰسِرُونَ,

Transliteration: (Kallazeena min qablikum kaanoo ashadda minkum quwwatanw wa aksara amwaalanw wa awlaadan fastamta'oo bikhalaaqihim fastamta'tum bikhalaaqikum kamas tamta'al lazeena min qablikum bikhalaa qihim wa khudtum kallazee khaadooo; ulaaa'ika habitat a'maaluhum fid dunyaa wal Aakhirati wa ulaaa'ika humul khaasiroon)

(ऐ मुनाफ़िक़ों!) जैसे तुमसे पहले वाले लोग तुमसे ज़्यादा ताक़तवर और माल व औलाद में ज़्यादा [189] थे। उन्होंने अपने हिस्से से फ़ायदा उठाया, तो तुमने भी अपने हिस्से से फ़ायदा उठाया, जैसे उनसे पहले वालों ने उठाया था। और तुम भी उसी तरह बेहूदा बातों में पड़े रहे जैसे वे पड़े थे। यही वे लोग हैं जिनके आमाल दुनिया और आख़िरत [191] में बर्बाद हो गए [190], और यही नुक़सान उठाने वाले हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 69 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 69 की तफ़्सीर

✅ [189] ताक़त और तबाही की तारीख़ी मिसालें

यह आयत नबी ﷺ से पहले की ताक़तवर क़ौमों की तरफ़ इशारा करती है, जैसे आद और समूद की क़ौमें, जो बेहद ताक़तवर थीं।

इस ताक़त के बावजूद, जब उन्होंने अल्लाह के किसी नबी की मुख़ालिफ़त की, तो वे हलाक कर दिए गए। इसलिए ऐ मुनाफ़िक़ों! अपने अंजाम से ख़बरदार रहो।

इससे हम सीखते हैं कि माद्दी ताक़त हमेशा रूहानी ताक़त से शिकस्त खाती है। ग़ौर कीजिए: हज़रत मूसा (अलै.) ने अकेले सत्तर हज़ार जादूगरों को शिकस्त दी। दुनिया की पूरी ताक़तें न सिर्फ़ नबी के आगे, बल्कि एक वली (नबी के नायब) के आगे भी नाकाम रहती हैं।

✅ [190] मुख़ालिफ़त से नेक आमाल का बर्बाद होना

इससे हम दो बातें सीखते हैं:

  • अल्लाह के नबी की मुख़ालिफ़त से नेक काम बर्बाद हो जाते हैं, जबकि गुनाह अपनी जगह बरक़रार रहते हैं। कुफ़्र नेक आमाल को ज़ब्त करने (छीनने) का सबब है।
  • क़ियास (अनालजी) एक सच्चाई है, और शरीअत के मामलों में क़ियास को मान्यता दी जाती है। क्योंकि अल्लाह ने अपने बंदों को क़ियास से समझाया है कि ऐ हाल के मुनाफ़िक़ों और काफ़िरों! तुम्हारे बुरे आक़ीदे और बेहूदगी पिछले काफ़िरों जैसी हैं, तो तुम्हारा अंजाम भी उन्हीं जैसा — तबाही — होगा। यही क़ियास है: एक जैसी वजह के लिए एक जैसा हुक्म। अल्लाह फ़रमाता है: "तो सबक़ लो, ऐ आँखों वालो!" (सूरा हश्र 59:2)

✅ [191] दुनिया और आख़िरत में नेक आमाल के नतीजे

नेक आमाल इंसान को दुनिया में फ़ायदा पहुँचाते हैं — आफ़तों से बचाते हैं, माल बढ़ाते हैं और हर इज़्ज़त देते हैं। अल्लाह फ़रमाता है: "और जो अल्लाह से डरे, अल्लाह उसके लिए निकलने का रास्ता बना देगा, और उसे वहाँ से रोज़ी देगा जहाँ से उसे ख़याल भी न हो" (सूरा तलाक़ 65:2-3)। आख़िरत में भी यही आमाल उसके नजात दहिंदे होंगे, जिनसे उसे अल्लाह की नेमतें मिलेंगी।

इसके उलट, नेकी काफ़िर को न दुनिया में नफ़ा देती है न आख़िरत में। इससे हम सीखते हैं कि काफ़िरों की दुआएँ, दम (झाड़-फूँक) और तावीज़ न सिर्फ़ बेफ़ायदा हैं, बल्कि बेकार हैं।

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