कुरान - 52:16 सूरह अत-तूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

16
ٱصۡلَوۡهَا فَٱصۡبِرُوٓاْ أَوۡ لَا تَصۡبِرُواْ سَوَآءٌ عَلَيۡكُمۡۖ إِنَّمَا تُجۡزَوۡنَ مَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ

Transliteration: (Islawhaa fasbirooo aw laa tasbiroo sawaaa'un 'alaikum innamaa tujzawna maa kuntum ta'maloon)

"उसमें झुलसने के लिए दाख़िल हो जाओ! अब चाहे तुम सब्र करो या सब्र न करो [14], तुम्हारे लिए सब बराबर है। तुम्हें सिर्फ़ उन्हीं आमाल का बदला दिया जा रहा है जो तुम किया करते थे [15]।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तूर आयत 16 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अत-तूर तफ़सीर - आयत 16

"उसमें झुलसने के लिए दाख़िल हो जाओ! अब चाहे तुम सब्र करो या सब्र न करो [14], तुम्हारे लिए सब बराबर है। तुम्हें सिर्फ़ उन्हीं आमाल का बदला दिया जा रहा है जो तुम किया करते थे [15]।"


[14] काफ़िरों के लिए सब्र का कोई फ़ायदा नहीं

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि दोज़ख़ में काफ़िरों के लिए सब्र और बे-सब्री दोनों एक जैसी बे-फ़ायदा होंगी:

  • आख़िरत में काफ़िरों का सब्र: दुनिया में तो अहले-ईमान को सब्र पर अज्र व सवाब मिलता है, मगर आख़िरत में मुनकिरीन और काफ़िरों के लिए सब्र का कोई बदला नहीं। वे चीख़ें-चिल्लाएँ या ख़ामोश रहें, उनके अज़ाब में कोई कमी नहीं की जाएगी।
  • राहत का कोई रास्ता नहीं: दोज़ख़ का अज़ाब हमेशा रहने वाला है, इसलिए वहाँ काफ़िरों के लिए उम्मीद या रिहाई का कोई दरवाज़ा खुला नहीं रहेगा।

[15] आमाल और बातिल अक़ीदों का बदला

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि दोज़ख़ का यह अज़ाब अल्लाह की तरफ़ से कोई ज़ुल्म नहीं, बल्कि बंदों के अपने किए का नतीजा है:

  • आमाल की जवाबदेही: इंसान जो कुछ दुनिया में बोता है, आख़िरत में वही काटता है। कुफ़्र, शिर्क और नबियों की मुख़ालफ़त सबसे बड़े जुर्म हैं जिनकी सज़ा यह आग है।
  • दिल का कुफ़्र: अगर किसी काफ़िर ने दुनिया में ज़ाहिरी तौर पर कुछ भले काम भी किए हों, तो दिल के कुफ़्र और अक़ीदे की ख़राबी की वजह से उसके आमाल अकारत हो जाते हैं और वह जहन्नम का हक़दार ठहरता है।

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