हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि इस आयत में अल्लाह तआला ने कोह-ए-तूर की क़सम खाई है:
मूसा (अलैहिस्सलाम) से हम-कलामी का मक़ाम: मिस्र और मदाइन के दरमियान वादी-ए-सीना में वाक़े कोह-ए-तूर वह मुक़द्दस पहाड़ है जहाँ हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह तआला से हम-कलामी का शरफ़ हासिल किया।
निस्बत की बरकत: कोह-ए-तूर की क़सम खाना इस मक़ाम की अज़मत और तक़द्दुस को ज़ाहिर फ़रमाता है। किसी नबी-ए-बरहक़ की निस्बत से उस मक़ाम को यह ख़ास रिफ़अत और एहतिराम हासिल हुआ।
अंबिया व औलिया के मक़ामात का एहतिराम: इससे यह अज़ीम दर्स मिलता है कि अल्लाह के नबियों और औलिया से मंसूब मक़ामात, यादगारें और अशिया बरकत और इज़्ज़त वाली बन जाती हैं।
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