हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि 'सक़्फ़िम मरफ़ूअ' से मुराद बुलंद छत है:
आसमान बतौर छत: इससे मुराद यह नीला आसमान है जो ज़मीन वालों के लिए बिना किसी सुतून के बुलंद छत की तरह क़ायम है, जैसा कि दूसरी जगह फ़रमाया: "और हमने आसमान को महफ़ूज़ छत बनाया"।
अर्श-ए-आज़म: या इससे मुराद अर्श-ए-इलाही है जो तमाम जन्नतों की छत है।
हिकमत व रब्त: पिछली आयत में बैत (घर) का ज़िक्र फ़रमाया, और उसके फ़ौरन बाद छत का ज़िक्र फ़रमाना कलाम की कमाल-ए-फ़साहत और निहायत हिकमत-आमेज़ मुनासिबत को ज़ाहिर करता है (तफ़सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान व रूह-उल-मआनी)।
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