कुरान - 52:21 सूरह अत-तूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

21
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَٱتَّبَعَتۡهُمۡ ذُرِّيَّتُهُم بِإِيمَٰنٍ أَلۡحَقۡنَا بِهِمۡ ذُرِّيَّتَهُمۡ وَمَآ أَلَتۡنَٰهُم مِّنۡ عَمَلِهِم مِّن شَيۡءٖۚ كُلُّ ٱمۡرِيِٕۭ بِمَا كَسَبَ رَهِينٞ

Transliteration: (Wallazeena aamanoo wattaba'at hum zurriyyatuhum bieemaanin alhaqnaa bihim zurriyyatahum wa maaa alatnaahum min 'amalihim min shai'; kullum ri'im bimaa kasaba raheen)

और जो लोग ईमान लाए और उनकी औलाद ने भी ईमान के साथ उनकी पैरवी की, हम उनकी औलाद को भी (जन्नत में) उनसे मिला देंगे [23], और हम उनके आमाल में से कुछ भी कम न करेंगे [24]। हर इंसान अपने किए हुए आमाल में गिरवी है [25]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तूर आयत 21 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अत-तूर तफ़सीर - आयत 21

"और जो लोग ईमान लाए और उनकी औलाद ने भी ईमान के साथ उनकी पैरवी की, हम उनकी औलाद को भी (जन्नत में) उनसे मिला देंगे [23], और हम उनके आमाल में से कुछ भी कम न करेंगे [24]। हर इंसान अपने किए हुए आमाल में गिरवी है [25]।"


[23] मोमिनीन और उनकी मोमिन औलाद का मिलाप व वसीला

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि यह आयत अहले-ईमान के लिए बहुत बड़ी बशारत है:

  • औलाद का वालिदैन से मिलाप: अगर मोमिन वालिदैन के बच्चे भी ईमान की राह पर चले, तो अल्लाह तआला अपने फ़ज़्ल से कम दर्जे वाले बच्चों को उनके बुलंद मर्तबा वालिदैन के साथ जन्नत में एक जगह जमा फ़रमा देगा, ताकि वालिदैन की आँखें ठंडी हों।
  • शर्त-ए-ईमान: शर्त यह है कि औलाद बा-ईमान हो; अगर औलाद काफ़िर रही (जैसे हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का बेटा कनआन), तो वह वालिदैन के साथ नहीं मिल सकेगी।
  • वसीला का सुबूत: इससे साबित हुआ कि बड़ों की नेकी और बुलंदी का फ़ैज़ उनके छोटों को पहुँचता है, और यह शफ़ाअत व वसीले की वाज़ेह दलील है।

[24] दर्जात की बुलंदी और सवाब की हिफ़ाज़त

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि बच्चों को वालिदैन के दर्जे में पहुँचाने से वालिदैन के सवाब में कोई कमी नहीं होगी:

  • सवाब की कामिल अता: अल्लाह तआला वालिदैन के आमाल और दरजात में से कोई चीज़ कम नहीं फ़रमाएगा, बल्कि बच्चों को ऊपर उठाकर वालिदैन के बराबर कर देगा। यह अल्लाह के फ़ज़्ल का कमाल है।

[25] आमाल की जवाबदेही और काफ़िरों का अंजाम

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि 'कुल्लुमरिइम बिमा कसबा रहीन' का उसूल हर शख़्स पर लागू होता है:

  • काफ़िर अपने गुनाहों में गिरवी: काफ़िर और बद-अमल लोग अपने कुफ़्र और गुनाहों की ज़ंजीरों में जकड़े रहेंगे और उन्हें कोई बचाने वाला न होगा।
  • मोमिनों की रिहाई: जबकि सच्चे मोमिनीन अल्लाह के फ़ज़्ल और रहमत से आज़ाद होकर अपने कुंबे के साथ जन्नत की शादमानी मनाएंगे।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now