कुरान - 52:26 सूरह अत-तूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

26
قَالُوٓاْ إِنَّا كُنَّا قَبۡلُ فِيٓ أَهۡلِنَا مُشۡفِقِينَ

Transliteration: (Qaalooo innaa kunnaa qablu feee ahlinaa mushfiqeen)

वे कहेंगे: "बेशक हम इससे पहले अपने घर वालों के दरमियान (अल्लाह के ख़ौफ़ से) डरते रहते थे [31]!" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तूर आयत 26 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अत-तूर तफ़सीर - आयत 26

"वे कहेंगे: 'बेशक हम इससे पहले अपने घर वालों के दरमियान (अल्लाह के ख़ौफ़ से) डरते रहते थे [31]!'"


[31] दुनिया में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा और उसके समरात

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि इस आयत-ए-मुबारका से तीन बड़े दर्स हासिल होते हैं:

  1. दुनिया की याद: अहले-जन्नत को अपनी दुनियावी ज़िंदगी की नेकियाँ, आज़माइशें और हालात पूरी तरह याद रहेंगे और वे उनका ज़िक्र करेंगे।
  2. ख़ौफ़-ए-ख़ुदा असल नेकी है: इंसान चाहे जितनी भी इबादत और नेकी कर ले, दिल में अल्लाह का ख़ौफ़ और आजिज़ी रहनी चाहिए। यही ख़ौफ़-ए-इलाही तक़वे की जान है।
  3. दुनिया का डर आख़िरत का अमन बन गया: जो शख़्स दुनिया में अल्लाह की नाफ़रमानी से डरता रहा, अल्लाह तआला ने आख़िरत में उसे हर तरह के डर, अज़ाब और ख़ौफ़ से हमेशा के लिए अमन व सलामती अता फ़रमा दी।

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