कुरान - 52:29 सूरह अत-तूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

29
فَذَكِّرۡ فَمَآ أَنتَ بِنِعۡمَتِ رَبِّكَ بِكَاهِنٖ وَلَا مَجۡنُونٍ

Transliteration: (Fazakkir famaaa anta bini'mati rabbika bikaahininw wa laa majnoon)

तो (ऐ हबीब!) आप नसीहत फ़रमाते रहिए [34], क्योंकि अपने रब के फ़ज़्ल व करम से आप न काहिन (ग़ैब के झूठे दावेदार) हैं और न मजनूँ [35]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तूर आयत 29 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अत-तूर तफ़सीर - आयत 29

"तो (ऐ हबीब!) आप नसीहत फ़रमाते रहिए [34], क्योंकि अपने रब के फ़ज़्ल व करम से आप न काहिन (ग़ैब के झूठे दावेदार) हैं और न मजनूँ [35]!"


[34] तमाम मख़लूक़ को हिदायत व नसीहत का हुक्म

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि अल्लाह तआला ने अपने महबूब ﷺ को दावत-ओ-तबलीग़ जारी रखने का हुक्म दिया:

  • हर तबक़े के लिए नसीहत: हुज़ूर ﷺ की नसीहत और दावत तमाम आलमीन के लिए है:
    • काफ़िरों के लिए ताकि वे ईमान लाएँ।
    • मोमिनों के लिए ताकि वे नेक आमाल पर साबित-क़दम रहें।
    • और ख़ास बंदों व आरिफ़ीन के लिए ताकि उनकी मारिफ़त और दरजात में मज़ीद तरक़्क़ी हो।

[35] वह्य-ए-इलाही की हक़्क़ानियत और इल्म-ए-ग़ैब की शान

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि काफ़िर हुज़ूर ﷺ पर जो बातिल इल्ज़ाम लगाते थे, यह आयत उसका मुँह-तोड़ जवाब देती है:

  • काहिन के इल्ज़ाम का रद्द: काहिन शयातीन और जिन्नात की अफ़वाहों पर तकिया करके अटकल-पच्चू बातें करते थे। जबकि हुज़ूर ﷺ का इल्म-ए-ग़ैब अल्लाह तआला की अता और वह्य-ए-मुबारका से है जो सौ फ़ीसद बरहक़ और क़तई है।
  • मजनूँ के बोहतान का रद्द: मजनूँ तो अपनी ज़ात तक से बे-ख़बर होता है, जबकि हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ दोनों जहाँ के आलिम और अक़्ल-ए-कुल हैं। आप पर रब का ऐसा अज़ीम फ़ज़्ल है कि कायनात का कोई दाना भी आपकी नज़र से ओझल नहीं।

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