कुरान - 52:33 सूरह अत-तूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

33
أَمۡ يَقُولُونَ تَقَوَّلَهُۥۚ بَل لَّا يُؤۡمِنُونَ

Transliteration: (Am yaqooloona taqawwalah; bal laa yu'minoon)

या वे कहते हैं: "इन्होंने इस (क़ुरआन) को ख़ुद गढ़ लिया है!" बल्कि बात यह है कि वे ईमान ही नहीं लाना चाहते! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तूर आयत 33 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अत-तूर तफ़सीर - आयत 33

"या वे कहते हैं: 'इन्होंने इस (क़ुरआन) को ख़ुद गढ़ लिया है!' बल्कि बात यह है कि वे ईमान ही नहीं लाना चाहते!"


क़ुरआन गढ़ने का बेबुनियाद इल्ज़ाम और मुनकिरीन की हठधर्मी

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि काफ़िरों का यह दावा कि क़ुरआन नबी करीम ﷺ का अपना कलाम है, सरासर झूठ है:

  • कलाम-ए-इलाही की शान: क़ुरआन हकीम रब्बुल आलमीन का कलाम है, किसी इंसान का नहीं। अगर इंसान ऐसा कलाम बना सकता, तो अरब के बड़े-बड़े फ़सीह व बलीग़ शायर और ख़तीब इसकी मिसाल पेश कर देते।
  • हठधर्मी की इंतिहा: काफ़िरों का इंकार किसी दलील की कमी की वजह से नहीं था, बल्कि उनके दिलों पर कुफ़्र की मोहर लग चुकी थी और वे किसी क़ीमत पर ईमान नहीं लाना चाहते थे।

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