Transliteration: (Awa mai yunashsha'u fil hilyati wa huwa fil khisaami ghairu mubeen)
"क्या वह जो ज़ेवर (गहनों) में पाली जाती है [27] और झगड़े (बहस-मुबाहिसे) में अपनी बात साफ़ नहीं कह पाती [28] (उसे अल्लाह की औलाद ठहराते हो)?"
यह आयत औरतों की तरफ़ इशारा करती है जो फ़ितरी तौर पर ज़ेवरात और हुस्न व सिंगार की तरफ़ माइल होती हैं। इससे यह बात भी समझ आती है कि ज़ेवर पहनना मर्दों और लड़कों के लिए मुनासिब नहीं, क्योंकि यह मर्दाना वक़ार के ख़िलाफ़ है। मर्द का अस्ल हुस्न इल्म, किरदार और पाकीज़गी में है।
औरत अपनी नाज़ुक फ़ित्रत की वजह से सख्त बहस या झगड़े के वक़्त अपनी दलील को मर्दों की तरह पुर-असर अंदाज़ में पेश नहीं कर पाती। क़ुरआन ने यह मुक़ाबला इसलिए पेश किया ताकि मुशरिकीन को उनकी नादानी दिखाई जाए कि वे ऐसी कमज़ोर मख़्लूक़ को उस बे-ऐब ख़ालिक़ की तरफ़ मंसूब करते हैं जो तमाम कमज़ोरियों से पाक है।
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