कुरान - 43:19 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

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Transliteration: (Wa ja'alul malaaa'ikatal lazeena hum 'ibaadur Rahmaani inaasaa; 'a shahidoo khalqahum; satuktabu shahaadatuhum wa yus'aloon)

और उन्होंने फ़रिश्तों को, जो ख़ुद रहमान के बंदे हैं, औरतें क़रार दे दिया [29]; क्या वे उनकी पैदाइश के वक़्त मौजूद थे [30]? उनकी यह गवाही अभी लिख ली जाएगी [31] और उनसे सवाल पूछा जाएगा! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 19 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 19

"और उन्होंने फ़रिश्तों को, जो ख़ुद रहमान के बंदे हैं, औरतें क़रार दे दिया [29]; क्या वे उनकी पैदाइश के वक़्त मौजूद थे [30]? उनकी यह गवाही अभी लिख ली जाएगी [31] और उनसे सवाल पूछा जाएगा!"

[29] काफ़िरों का तीन गुना कुफ़्र

काफ़िरों ने इस एक जुमले में तीन तरह का कुफ़्र किया:

  1. उन्होंने अल्लाह के लिए झूठी औलाद ठहराई।

  2. अपने लिए तो बेटे पसंद किए, लेकिन अल्लाह के लिए बेटियां तजवीज़ कीं।

  3. उन्होंने फ़रिश्तों को औरतें कहकर उनकी शान में गुस्ताख़ी की, जो कि उनकी पाकीज़ा फ़ित्रत के ख़िलाफ़ है। इससे मालूम हुआ कि फ़रिश्तों की तौहीन करना कुफ़्र है, और यह भी सबक़ मिलता है कि अपनी औलाद को ग़ुलामों जैसा नहीं समझा जा सकता।

[30] दावे की बे-बुनियादी

चूंकि किसी इंसान ने फ़रिश्तों की पैदाइश को नहीं देखा, और न ही किसी नबी ने कभी यह फ़रमाया कि फ़रिश्ते औरतें हैं, इसलिए मुशरिकीन का यह दावा सरासर मनघड़ंत और बकवास है।

[31] झूठी गवाही का लिखा जाना और बाज़पुर्स

उनके इस झूठे दावे को "गवाही" क़रार दिया गया क्योंकि वे इस पर इसरार करते थे। यह गवाही उनके गुनाहों के नाम-ए-आमाल में दर्ज की जा रही है और आख़िरत में उनसे इस झूठे अक़ीदे की सख़्त बाज़पुर्स होगी।

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