कुरान - 43:20 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

20
وَقَالُواْ لَوۡ شَآءَ ٱلرَّحۡمَٰنُ مَا عَبَدۡنَٰهُمۗ مَّا لَهُم بِذَٰلِكَ مِنۡ عِلۡمٍۖ إِنۡ هُمۡ إِلَّا يَخۡرُصُونَ

Transliteration: (Wa qaaloo law shaaa'ar Rahmaanu maa 'abadnaahum; maa lahum bizaalika min 'ilmin in hum illaa yakhrusoon)

और वे कहते हैं: 'अगर रहमान चाहता तो हम उनकी पूजा न करते [32];' उनके पास इसका कोई इल्म नहीं, वे तो बस अटकलें (झूठ) दौड़ाते हैं [33]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 20 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 20

"और वे कहते हैं: 'अगर रहमान चाहता तो हम उनकी पूजा न करते [32];' उनके पास इसका कोई इल्म नहीं, वे तो बस अटकलें (झूठ) दौड़ाते हैं [33]!"

[32] मशिय्यत (इरादे) और रज़ा में फ़र्क़ न समझना

काफ़िरों ने अल्लाह के इरादे (मशिय्यत) को उसकी रज़ा (पसंदीदगी) के साथ मिला दिया। उन्होंने यह ग़लत दलील दी कि: "अगर बुत-परस्ती ग़लत होती तो अल्लाह हमें ऐसा न करने देता।"

यह सरासर बातिल दलील है। मिसाल के तौर पर, अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को अपने बेटे को ज़बह करने का हुक्म फ़रमाया, लेकिन हक़ीक़ी ज़बह करना न तो मकसूद था और न ही अल्लाह की रज़ा थी। इसी तरह, अल्लाह तआला आज़माइश के तौर पर कुफ़्र की मोहलत देता है, लेकिन वह कुफ़्र को कभी पसंद नहीं फ़रमाता।

[33] झूठे बहाने और अटकलें

वे अपने अक़ाइद को अंदाज़ों और अफ़वाहों पर क़ायम किए हुए थे, हक़ीक़ी इल्म पर नहीं। ईमान के मुआमलात में सिर्फ़ राय और क़यास की कोई क़ीमत नहीं होती। उनकी दलील सरासर झूठ है जिसकी कोई इलाही सनद मौजूद नहीं।

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