Transliteration: (Fantaqamnaa minhum fanzur kaifa kaana 'aaqibatul mukazzibeen (section 2))
"तो हमने उनसे बदला ले लिया [40]; पस देखिए कि झुटलाने वालों का कैसा बुरा अंजाम हुआ [41]!"
यहां दो अहम अस्बाक़ सामने आते हैं:
इलाही अज़ाब सिर्फ़ नबी के इन्कार के बाद ही नाज़िल होता है, चाहे इंसान कुफ़्र में कितना ही आगे क्यों न बढ़ चुका हो।
अल्लाह तआला अपने प्यारे नबियों का ख़ुद दिफ़ाअ फ़रमाता है, और उनके पैरोकारों को उनकी ख़िदमत करने और उस ख़िदमत के ज़रिए सवाब हासिल करने का शरफ़ बख़्शता है। नबी की हिमायत करना इलाही फ़ज़्ल का ज़रिया है।
यह आयत मक्का के काफ़िरों से मुख़ातब है, जो अपने तिजारती सफ़रों के दौरान तबाहशुदा क़ौमों के खंडरात के पास से गुज़रते थे। यह ज़ोर देती है कि इंसान को इन तबाहियों पर एक चेतावनी के तौर पर ग़ौर व फ़िक्र करना चाहिए। जिस तरह इंसान अल्लाह के अज़ाब को देखता है, उसी तरह उसे अल्लाह के प्यारों की सरज़मीनों की अज़मत को भी देखना चाहिए, जहां उसकी रहमत और करम के जलवे ज़ाहिर होते हैं।
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