कुरान - 43:26 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

26
وَإِذۡ قَالَ إِبۡرَٰهِيمُ لِأَبِيهِ وَقَوۡمِهِۦٓ إِنَّنِي بَرَآءٞ مِّمَّا تَعۡبُدُونَ

Transliteration: (Wa iz qaala Ibraaheemu liabeehi wa qawmiheee innane baraaa'um mimmaa ta'budoon)

और जब इब्राहीम ने अपने बाप और अपनी क़ौम से फ़रमाया: 'बेशक मैं उन सब (माबूदों) से बेज़ार (अलग) हूं जिनकी तुम पूजा करते हो [42]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 26 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 26

"और जब इब्राहीम ने अपने बाप और अपनी क़ौम से फ़रमाया: 'बेशक मैं उन सब (माबूदों) से बेज़ार (अलग) हूं जिनकी तुम पूजा करते हो [42];"

[42] बातिल से खुला ऐलान-ए-बेज़ारी

यह आयत हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बुत-परस्ती के ख़िलाफ़ सख़्त मौक़फ़ को बयान करती है, चाहे वह उनके अपने बाप और क़ौम ही का अमल क्यों न रहा हो। इससे हम सीखते हैं कि तक़िय्या (छुपाव या दो-रुखी) अपनाना इब्राहीम अलैहिस्सलाम का तरीक़ा नहीं है। इस्लाम को बेबाक हक़गोई के ज़रिए हमेशा के लिए क़ायम किया गया, न कि छुपे हुए समझौतों के ज़रिए।

यह यह भी दिखाता है कि अंबिया निहायत बहादुर थे और सिर्फ़ अल्लाह से डरते थे। कुफ़्र से नफ़रत व बेज़ारी का इज़हार उतना ही ज़रूरी है जितना कि अल्लाह के नेक बंदों से मोहब्बत, ख़्वाह वे मुनकिरीन अपने क़रीबी ख़ानदान ही के लोग क्यों न हों।

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