कुरान - 43:24 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

24
۞قَٰلَ أَوَلَوۡ جِئۡتُكُم بِأَهۡدَىٰ مِمَّا وَجَدتُّمۡ عَلَيۡهِ ءَابَآءَكُمۡۖ قَالُوٓاْ إِنَّا بِمَآ أُرۡسِلۡتُم بِهِۦ كَٰفِرُونَ

Transliteration: (Qaala awa law ji'tukum bi ahdaa mimmaa wajatdtum 'alaihi aabaaa'akum qaalooo innaa bimaaa ursiltum bihee kaafiroon)

(रसूल ने) फ़रमाया: 'ख़्वाह मैं तुम्हारे पास उससे कहीं ज़्यादा हिदायत वाला रास्ता लेकर आया होऊं जिस पर तुमने अपने बाप-दादा को पाया [38]?' वे बोले: 'जिस (पैग़ाम) के साथ तुम भेजे गए हो हम तो उसका इन्कार करने वाले हैं [39]!' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 24 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 24

"(रसूल ने) फ़रमाया: 'ख़्वाह मैं तुम्हारे पास उससे कहीं ज़्यादा हिदायत वाला रास्ता लेकर आया होऊं जिस पर तुमने अपने बाप-दादा को पाया [38]?' वे बोले: 'जिस (पैग़ाम) के साथ तुम भेजे गए हो हम तो उसका इन्कार करने वाले हैं [39]!'"

[38] हक़ और बातिल के दरमियान कोई मुक़ाबला नहीं

नबी ने उनसे सवाल फ़रमाया कि क्या वे तब भी अपने बाप-दादा के पीछे चलेंगे जब वह उनके पास उससे बेहतर और रौशन रास्ता लेकर आए हैं? यहां "ज़्यादा हिदायत वाला" का लफ़्ज़ मुशरिकीन की ज़बान में एक अक़्ली अपील के तौर पर इस्तेमाल हुआ है, वर्ना बातिल में तो हिदायत का कोई हिस्सा ही नहीं होता।

[39] हक़ के वाज़ेह होने के बावजूद खुला इन्कार

उनका जवाब उनकी गहरी हठधर्मी को बेनक़ाब करता है: यानी अगर नबी हक़ पर भी हों, तब भी वे कुफ़्र ही को चुनेंगे सिर्फ़ इसलिए ताकि अपने बाप-दादा की ग़लत रीत पर क़ायम रह सकें। यह दिखाता है कि अंधी तक़लीद किस तरह इंसान को इलाही हिदायत के खुले इन्कार तक पहुंचा देती है।

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