कुरान - 43:23 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

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Transliteration: (Wa kazaalika maaa arsalnaa min qablika fee qaryatim min nazeerin illaa qaala mutrafoohaaa innaa wajadnaaa aabaaa'anaa 'alaaa ummatinw wa innaa 'alaaa aasaarihim muqtadoon)

और इसी तरह हमने आपसे पहले जिस बस्ती में भी कोई डराने वाला (रसूल) भेजा, तो वहां के ख़ुशहाल (अमीर) लोगों ने यही कहा [36]: 'हमने अपने बाप-दादा को एक तरीक़े पर पाया है और हम उन्हीं के नक़्शे-क़दम की पैरवी करने वाले हैं [37]।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 23 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 23

"और इसी तरह हमने आपसे पहले जिस बस्ती में भी कोई डराने वाला (रसूल) भेजा, तो वहां के ख़ुशहाल (अमीर) लोगों ने यही कहा [36]: 'हमने अपने बाप-दादा को एक तरीक़े पर पाया है और हम उन्हीं के नक़्शे-क़दम की पैरवी करने वाले हैं [37]।'"

[36] अमीर और मुतकब्बिर लोगों की तरफ़ से नबियों का इन्कार

यह आयत उजागर करती है कि अंबिया-ए-किराम का इन्कार सबसे पहले मालदार और मुतकब्बिर सरदारों ने किया, जबकि ग़रीब और मिस्कीन लोगों ने सच्चाई को सबसे पहले क़बूल किया। दौलत और ऐश व इशरत अक्सर इंसान को हक़ क़बूल करने से अंधा कर देती है।

[37] बाप-दादा की पुरानी रस्मों पर हठधर्मी

हर दौर के काफ़िरों ने नबियों की दावत के मुक़ाबले में यही रटा-रटाया बहाना पेश किया कि हम अपने आबा-ओ-अज्दाद का तरीक़ा नहीं छोड़ सकते।

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