कुरान - 43:3 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

3
إِنَّا جَعَلۡنَٰهُ قُرۡءَٰنًا عَرَبِيّٗا لَّعَلَّكُمۡ تَعۡقِلُونَ

Transliteration: (Innaa ja'alnaahu Quraanan 'Arabiyyal la'allakum ta'qiloon)

बेशक हमने इसे अरबी क़ुरआन बनाया [2] ताकि तुम अक़्ल से काम लो (समझ सको) [3]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 3

"बेशक हमने इसे अरबी क़ुरआन बनाया [2] ताकि तुम अक़्ल से काम लो [3]!"

[2] वही में अरबी ज़बान की यकताई (मुम्ताज़ शान)

यह बात याद रखनी चाहिए कि क़ुरआन-ए-पाक के अलावा कोई दूसरी आसमानी किताब अरबी ज़बान में नाज़िल नहीं हुई। इसकी वजह यह है कि हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ के अलावा हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की नसल में से कोई भी नबी अरब के ख़ित्ते में ज़ाहिर नहीं हुआ। पिछली तमाम आसमानी किताबें इब्रानी (हिब्रू) ज़बान में नाज़िल हुईं, जो आज अपनी असली पैग़म्बराना शक्ल में बहुत हद तक ख़त्म (नापैद) हो चुकी है।

इसके बरअक्स, अरबी ज़बान हमेशा ज़िंदा रही है और यहां तक कि एक बैनुल-अक़्वामी ज़बान बन चुकी है—और यह सब मुकम्मल तौर पर क़ुरआन-ए-करीम के कभी न ख़त्म होने वाले असर व बरकत की वजह से है। इससे हमें यह समझ हासिल होती है कि अरबी ज़बान तमाम दूसरी ज़बानों से अफ़ज़ल व आला है, क्योंकि अल्लाह तआला ने इसे अपनी आख़िरी वही के ज़रीए के तौर पर मुंतख़ब फ़रमाया।

इसके अलावा, अरबी की अहमियत इस दुनियावी ज़िंदगी से कहीं आगे तक फैली हुई है। इस्लामी अक़ीदे के मुताबिक़:

  • क़ब्र के सवाल-जवाब अरबी में होंगे।

  • क़यामत के दिन का हिसाब-किताब अरबी में होगा।

  • जन्नत की ज़बान अरबी होगी।

  • और अरबी हमारे प्यारे नबी ﷺ की मुबारक ज़बान थी।

पस, अरबी को एक रूहानी ज़बान के तौर पर पहचाना जाता है, जबकि दूसरी ज़बानें आरज़ी और दुनियावी मक़ासिर के लिए काम आती हैं।

[3] रहनुमा के तौर पर अरबों का किरदार

"ताकि तुम समझ सको" वही के इब्तिदाई मुख़ातब यानी अरब के लोगों की तरफ़ तवज्जोह दिलाता है। उनकी ज़बान और तब्लीग़ के ज़रिए, बाक़ी तमाम इंसानियत क़ुरआन के पैग़ाम को समझने के क़ाबिल होगी।

यह आयत बुनियादी तौर पर अरबों को मुअल्लिम (उस्ताद) के मक़ाम पर रखती है, जबकि बाक़ी दुनिया उनकी शागिर्द बनती है। अरबी ज़बान पर उनकी महारत और नबी ﷺ के साथ उनकी क़ुर्बत ने उन्हें इलाही इल्म का पहला मुहाफ़िज़ व पैग़ाम-रसां बनाया, जिन्हें अपनी सरहदों से पार इस पैग़ाम को फैलाने की अज़ीम ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी।

लिहाज़ा, यह आयत अरबी की लिसानी शान और तमाम इंसानियत तक इलाही हिदायत पहुंचाने में अरबों के मुक़द्दस किरदार दोनों की अज़मत को उजागर करती है।

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