कुरान - 43:4 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

4
وَإِنَّهُۥ فِيٓ أُمِّ ٱلۡكِتَٰبِ لَدَيۡنَا لَعَلِيٌّ حَكِيمٌ

Transliteration: (Wa innahoo feee Ummil Kitaabi Ladainaa la'aliyyun hakeem)

और बेशक यह हमारे पास असल किताब (लौहे महफ़ूज़) में [4] निहायत बुलंद मर्तबा, हिकमत से भरपूर है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 4 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 4

"और बेशक यह हमारे पास असल किताब (लौहे महफ़ूज़) में [4] निहायत बुलंद मर्तबा, हिकमत से भरपूर है।"

[4] उम्मुल किताब में क़ुरआन का मक़ाम

"उम्मुल किताब" (किताबों की जड़ / असल) से मुराद लौहे महफ़ूज़ है, जहां क़ुरआन-ए-पाक नाज़िल होने से पहले पूरी तरह महफ़ूज़ था। इससे यह दलील मिलती है कि क़ुरआन-ए-पाक अल्लाह का अज़ली व क़दीम कलाम है, न कि कोई मख़्लूक़ चीज़।

इस आयत में क़ुरआन के दो अज़ीम औसाफ़ बयान किए गए हैं:

  • बुलंद मर्तबा (अली): अपनी शान व अज़मत में तमाम किताबों से बुलंद और अफ़ज़ल।

  • हिकमत वाला (हकीम): हिकमत, रहनुमाई और इलाही सच्चाई से लबरेज़।

दिलचस्प बात यह है कि यही दोनों मुबारक सिफ़ात—"अली" और "हकीम"—अल्लाह तआला के अस्मा-ए-हुस्ना में से भी हैं। यह ज़ाहिर करता है कि क़ुरआन-ए-पाक अपनी सिफ़ात में अल्लाह तआला के जलाल व हिकमत का अक्स है, जो इसकी बे-मिसाल बुलंदी और मुक़द्दस हैसियत को साबित करता है।

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