कुरान - 43:30 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

30
وَلَمَّا جَآءَهُمُ ٱلۡحَقُّ قَالُواْ هَٰذَا سِحۡرٞ وَإِنَّا بِهِۦ كَٰفِرُونَ

Transliteration: (Wa lammaa jaaa'ahumul haqqu qaaloo haazaa sihrunw wa innaa bihee kaafiroon)

और जब उनके पास हक़ (क़ुरआन) आ गया, तो वे कहने लगे: 'यह तो जादू है और बेशक हम इसका इन्कार करते हैं [47]!' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 30 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 30

"और जब उनके पास हक़ (क़ुरआन) आ गया, तो वे कहने लगे: 'यह तो जादू है और बेशक हम इसका इन्कार करते हैं [47]!'"

[47] रसूल का इन्कार कुफ़्र की जड़ है

यह आयत दिखाती है कि कुफ़्र की असली बुनियाद हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ का इन्कार करना है। काफ़िरों ने पहले रसूल का इन्कार किया, फिर क़ुरआन को ठुकराया, और बिल-आख़िर अल्लाह के मुनकिर हो गए।

इसके बरअक्स, सच्चे ईमान की इब्तिदा नबी ﷺ को तस्लीम करने से होती है। यही वजह है कि इस्लाम में किसी भी गैर-मुस्लिम से सबसे पहले कलिमा तय्यिबा पढ़ने को कहा जाता है—जिसमें वह अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान का ऐलान करता है—इससे पहले कि उसे इस्लाम का कोई दूसरा हुक्म सिखाया जाए। यह ऐलान ही ईमान का दरवाज़ा है।

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