कुरान - 43:32 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
أَهُمۡ يَقۡسِمُونَ رَحۡمَتَ رَبِّكَۚ نَحۡنُ قَسَمۡنَا بَيۡنَهُم مَّعِيشَتَهُمۡ فِي ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَاۚ وَرَفَعۡنَا بَعۡضَهُمۡ فَوۡقَ بَعۡضٖ دَرَجَٰتٖ لِّيَتَّخِذَ بَعۡضُهُم بَعۡضٗا سُخۡرِيّٗاۗ وَرَحۡمَتُ رَبِّكَ خَيۡرٞ مِّمَّا يَجۡمَعُونَ

Transliteration: ('A hum yaqsimoona rahmata Rabbik; Nahnu qasamnaa bainahum ma'eeshatahum fil hayaatid dunyaa wa rafa'naa ba'dahum fawqa ba'din darajaatin li yattakhiza ba'duhum ba'dan sukhriyyaa; wa rahmatu Rabbika khairun mimmaa yajma'oon)

क्या वे आपके रब की रहमत बांटते हैं [50]? हम ही ने दुनियावी ज़िंदगी में उनके दरमियान उनकी रोज़ी बांटी है [51], और हम ही ने उनमें से बाज़ को बाज़ पर दर्जों में बुलंदी दी है ताकि उनमें से एक दूसरे की ख़िदमत ले सके [52]; और आपके रब की रहमत उससे कहीं बेहतर है जिसे वे जमा करते हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 32

"क्या वे आपके रब की रहमत बांटते हैं [50]? हम ही ने दुनियावी ज़िंदगी में उनके दरमियान उनकी रोज़ी बांटी है [51], और हम ही ने उनमें से बाज़ को बाज़ पर दर्जों में बुलंदी दी है ताकि उनमें से एक दूसरे की ख़िदमत ले सके [52]; और आपके रब की रहमत उससे कहीं बेहतर है जिसे वे जमा करते हैं।"

[50] नबुव्वत बांटने का इख़्तियार बंदों के पास नहीं

यह आयत मुशरिकीन के इस एतिराज़ को मुकम्मल तौर पर मुस्तरद फ़रमाती है कि नबुव्वत किसी और को क्यों नहीं मिली। नबुव्वत अल्लाह तआला की ख़ास रहमत है, और इसे किस मुक़द्दस ज़ात को अता करना है—यह सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह का इख़्तियार है, न कि काफ़िरों या मुशरिकों का।

[51] दुनियावी रोज़ी की इलाही तक़सीम

अल्लाह तआला ने ही इंसानों के दरमियान उनकी दुनियावी रोज़ी, माशी वसाइल और सेहत को अपनी हिकमत के मुताबिक़ तक़सीम फ़रमाया है। जब बंदे मामूली दुनियावी दौलत को तक़सीम करने का इख़्तियार नहीं रखते, तो वे नबुव्वत जैसी अज़ीम-उश्शान इलाही नेमत को कैसे बांट सकते हैं?

[52] इंसानी समाज में दर्जात का तवाज़ुन

अल्लाह तआला ने इंसानों को मुतफ़ावित (अलग-अलग) दर्जों पर रखा है—कोई अमीर है तो कोई ग़रीब, कोई हाकिम है तो कोई मज़दूर—ताकि दुनिया का निज़ाम चल सके और एक इंसान दूसरे की सलाहियतों से फ़ायदा उठा सके। अगर सब बराबर होते तो कोई किसी का काम न करता। और आख़िरत की रहमत और नबुव्वत का शरफ़ उन तमाम दुनियावी ख़ज़ानों से कहीं आला है जिन्हें काफ़िर जमा करते हैं।

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