कुरान - 43:29 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

29
بَلۡ مَتَّعۡتُ هَـٰٓؤُلَآءِ وَءَابَآءَهُمۡ حَتَّىٰ جَآءَهُمُ ٱلۡحَقُّ وَرَسُولٞ مُّبِينٞ

Transliteration: (Bal matta'tu haaa'ulaaa'i wa aabaaa'ahum hattaa jaaa'a humul haqqu wa Rasoolun mubeen)

बल्कि मैंने इन (कुरैश) को और इनके बाप-दादा को दुनियावी फ़ायदा उठाने दिया [45], यहां तक कि उनके पास हक़ (क़ुरआन) और खोल कर बयान फ़रमाने वाला रसूल आ गया [46]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 29 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 29

"बल्कि मैंने इन (कुरैश) को और इनके बाप-दादा को दुनियावी फ़ायदा उठाने दिया [45], यहां तक कि उनके पास हक़ (क़ुरआन) और खोल कर बयान फ़रमाने वाला रसूल आ गया [46]।'"

[45] दुनियावी ऐश व इशरत ग़फ़लत का सबब

अल्लाह तआला ने काफ़िरों और उनके बाप-दादा को दुनियावी ऐश व नेमतें अता फ़रमाईं, जिसकी वजह से उनमें ग़फ़लत और तकब्बुर पैदा हो गया। दुनियावी आराम व आशाइश की मोहब्बत ने उन्हें अपने ख़ालिक़ और हक़ को पहचानने से अंधा कर दिया, जो उनके कुफ़्र और दुश्मनी की जड़ बन गया।

[46] हक़ का रौशन और वाज़ेह पैग़ाम

जब हक़—यानी क़ुरआन-ए-पाक—आया, तो वह एक रौशन और वाज़ेह रसूल ﷺ के साथ तशरीफ़ लाया। जिस तरह लौहे महफ़ूज़ को रौशन (किताब-ए-मुबीन) कहा गया है, उसी तरह क़ुरआन-ए-पाक और नबी-ए-करीम मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ भी रौशन व मुबीन हैं, जिनके मोजि़ज़ात और इल्मे-ग़ैब उनकी सच्ची नबुव्वत के ना-क़ाबिले-इन्कार सुबूत हैं।

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