कुरान - 43:36 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

36
وَمَن يَعۡشُ عَن ذِكۡرِ ٱلرَّحۡمَٰنِ نُقَيِّضۡ لَهُۥ شَيۡطَٰنٗا فَهُوَ لَهُۥ قَرِينٞ

Transliteration: (Wa mai ya'shu 'an zikrir Rahmaani nuqaiyid lahoo Shaitaanan fahuwa lahoo qareen)

और जो शख़्स रहमान के ज़िक्र (क़ुरआन) से मुंह फेरता है [61], हम उस पर एक शैतान मुक़र्रर कर देते हैं, पस वही उसका साथी बन जाता है [62]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 36 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 36

"और जो शख़्स रहमान के ज़िक्र (क़ुरआन) से मुंह फेरता है [61], हम उस पर एक शैतान मुक़र्रर कर देते हैं, पस वही उसका साथी बन जाता है [62]।"

[61] इलाही हिदायत से मुंह मोड़ना

यह आयत उन लोगों के अंजाम को बयान करती है जो अल्लाह के ज़िक्र यानी क़ुरआन-ए-पाक की हिदायत को नज़रअंदाज़ करते या ठुकराते हैं। ऐसा शख़्स रूहानी तौर पर अंधा हो जाता है, जो न हक़ को पहचान सकता है और न ही इलाही निशानियों से फ़ायदा उठा सकता है। यह अंधापन आंखों का नहीं बल्कि दिल और रूह का अंधापन है।

[62] बुरे साथी (शैतान) की लानत

नतीजे के तौर पर, अल्लाह तआला एक शैतान को उसका क़रीबी साथी मुक़र्रर फ़रमा देता है। यह शैतान उस आम क़रीन (हमज़ाद) से अलग है जो हर इंसान के साथ होता है, बल्कि यह एक सज़ा के तौर पर मुसलसल मुसल्लत रहने वाला बुरा असर है जो उसे हर लम्हा बहकाता और तबाह करता है। इसके बरअक्स, नेक और सालेह दोस्त अल्लाह की रहमत की निशानी है जो हक़ की तरफ़ रहनुमाई करता है। यह आयत ज़िक्र-ए-इलाही से ग़फ़लत और बुरी सोहबत की हलाकत से आगाह फ़रमाती है।

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