कुरान - 43:37 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

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Transliteration: (Wa innahum la yasuddoo nahum 'anis sabeeli wa yahsaboona annahum muhtadoon)

और बेशक वे (शैतान) उन्हें सीधी राह से रोकते हैं, मगर वे यह गुमान करते हैं कि वे बिल्कुल सही राह पर हैं [63]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 37 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 37

"और बेशक वे (शैतान) उन्हें सीधी राह से रोकते हैं, मगर वे यह गुमान करते हैं कि वे बिल्कुल सही राह पर हैं [63]!"

[63] गुमराही की बदतरीन क़िस्म (धोखे में मुब्तला रहना)

यह आयत रूहानी गुमराही की इंतिहा को बयान करती है—जब कोई इंसान शैतान के इस दर्जे असर में आ जाए कि वह सीधे रास्ते से बिल्कुल भटक चुका हो, लेकिन इसके बावजूद वह ख़ुद को सच्चा और हिदायत-याफ़्ता समझता रहे।

इसकी मिसाल एक ला-इलाज बीमारी (जैसे कैंसर की आख़िरी मंज़िल) की तरह है, जहाँ मरीज़ ग़लतफ़हमी में ख़ुद को बिल्कुल तंदुरुस्त समझता है और डॉक्टर को पागल क़रार देता है। ऐसी हालत में उसका इलाज तक़रीबन नामुमकिन हो जाता है। इसी तरह, जब कोई शख़्स अपने आप को नेक समझते हुए इलाही हक़ को ठुकराता है, तो उसके दिल पर हिदायत के दरवाज़े बंद हो जाते हैं।

अल्लाह तआला हमें इस फ़रेब और धोखे से महफ़ूज़ फ़रमाए और हक़ की राह पर साबित-क़दम रखे।

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