Transliteration: (Wa lai yanfa'akumul Yawma iz zalamtum annakum fil 'azaabi mushtarikoon)
"और आज तुम्हें यह बात हरगिज़ कोई फ़ायदा न देगी, जब कि तुमने ज़ुल्म किया था [67], कि तुम सब अज़ाब में बराबर के शरीक हो [68]।"
यह आयत वाज़ेह करती है कि क़यामत के दिन वह बुरी सोहबत जिसने काफ़िरों को बहकाया था, कोई नफ़ा न दे सकेगी। नेक साथियों के बरअक्स, जिनकी सोहबत शफ़ाअत और रहमत का ज़रिया बनती है, बुरे साथी सिर्फ़ अज़ाब और तक्लीफ़ में इज़ाफ़ा करेंगे। दुनिया की यह दोस्ती आख़िरत में सिर्फ़ मुश्तरका हसरत का सबब बनेगी।
आयत मज़ीद समझाती है कि काफ़िर, उनके शैतान, और गुमराही के रहनुमा सब के सब अज़ाब में बराबर के साझीदार होंगे। यह इलाही इंसाफ़ का आईना है—गुमराही फैलाने वाले और उसकी पैरवी करने वाले दोनों अपनी ज़िम्मेदारी के मुताबिक़ एक साथ पकड़े जाएंगे। जब कोई जान-बूझकर गुमराही अपनाता है तो गुनाह का बोझ दोनों पर होता है।
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