कुरान - 43:39 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

39
وَلَن يَنفَعَكُمُ ٱلۡيَوۡمَ إِذ ظَّلَمۡتُمۡ أَنَّكُمۡ فِي ٱلۡعَذَابِ مُشۡتَرِكُونَ

Transliteration: (Wa lai yanfa'akumul Yawma iz zalamtum annakum fil 'azaabi mushtarikoon)

और आज तुम्हें यह बात हरगिज़ कोई फ़ायदा न देगी, जब कि तुमने ज़ुल्म किया था [67], कि तुम सब अज़ाब में बराबर के शरीक हो [68]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 39 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 39

"और आज तुम्हें यह बात हरगिज़ कोई फ़ायदा न देगी, जब कि तुमने ज़ुल्म किया था [67], कि तुम सब अज़ाब में बराबर के शरीक हो [68]।"

[67] बुरे साथियों की सोहबत से कोई फ़ायदा नहीं

यह आयत वाज़ेह करती है कि क़यामत के दिन वह बुरी सोहबत जिसने काफ़िरों को बहकाया था, कोई नफ़ा न दे सकेगी। नेक साथियों के बरअक्स, जिनकी सोहबत शफ़ाअत और रहमत का ज़रिया बनती है, बुरे साथी सिर्फ़ अज़ाब और तक्लीफ़ में इज़ाफ़ा करेंगे। दुनिया की यह दोस्ती आख़िरत में सिर्फ़ मुश्तरका हसरत का सबब बनेगी।

[68] अज़ाब में मुश्तरका हिस्सेदारी और इलाही इंसाफ़

आयत मज़ीद समझाती है कि काफ़िर, उनके शैतान, और गुमराही के रहनुमा सब के सब अज़ाब में बराबर के साझीदार होंगे। यह इलाही इंसाफ़ का आईना है—गुमराही फैलाने वाले और उसकी पैरवी करने वाले दोनों अपनी ज़िम्मेदारी के मुताबिक़ एक साथ पकड़े जाएंगे। जब कोई जान-बूझकर गुमराही अपनाता है तो गुनाह का बोझ दोनों पर होता है।

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