कुरान - 43:52 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

52
أَمۡ أَنَا۠ خَيۡرٞ مِّنۡ هَٰذَا ٱلَّذِي هُوَ مَهِينٞ وَلَا يَكَادُ يُبِينُ

Transliteration: (Am ana khairun min haazal lazee huwa maheenunw wa laa yakaadu yubeen)

बल्कि क्या मैं उस शख़्स से बेहतर नहीं हूं [93] जो हक़ीर (कमज़ोर) है और साफ़ बात भी नहीं कर पाता [94]? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 52 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 52

"बल्कि क्या मैं उस शख़्स से बेहतर नहीं हूं [93] जो हक़ीर (कमज़ोर) है और साफ़ बात भी नहीं कर पाता [94]?"

[93] नबी के मुक़ाबले में अपनी बरतरी का झूठा दावा

फ़िरऔन ने निहायत गुस्ताख़ी के साथ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की फ़क़ीरी और ज़ाहिरी सादगी का मज़ाक़ उड़ाया और ख़ुद को उनसे बेहतर साबित करने की नापाक कोशिश की।

[94] मूसा अलैहिस्सलाम की ज़बान की लुकनत का ताअ़्ना

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की ज़बान-ए-मुबारक में बचपन के अंगारे के असर से जो लुकनत (हकलाहट) थी, फ़िरऔन ने उसका ताअ़्ना दिया। हालांकि जब मूसा अलैहिस्सलाम ने दुआ फ़रमाई 'वहलुल उक़्दतम मिल लिसानी' तो वह लुकनत ख़त्म हो चुकी थी, लेकिन फ़िरऔन ने अपनी अंधी अना में पुरानी बात को उछाल कर अवाम को भड़काया।

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