कुरान - 43:54 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

54
فَٱسۡتَخَفَّ قَوۡمَهُۥ فَأَطَاعُوهُۚ إِنَّهُمۡ كَانُواْ قَوۡمٗا فَٰسِقِينَ

Transliteration: (Fastakhaffa qawmahoo fa ataa'ooh; innahum kaanoo qawman faasiqeen)

पस उसने अपनी क़ौम की अक़्लों को हल्का (बेवक़ूफ़) बना दिया, तो वे उसकी इताअत करने लगे; बेशक वे नाफ़रमान लोग थे [97]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 54 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 54

"पस उसने अपनी क़ौम की अक़्लों को हल्का (बेवक़ूफ़) बना दिया, तो वे उसकी इताअत करने लगे; बेशक वे नाफ़रमान लोग थे [97]।"

[97] दुनियावी चमक-दमक से अवाम का बहक जाना

फ़िरऔन ने अपने झूठे प्रचार और दुनियावी चमक-दमक के ज़रिए अपनी क़ौम की अक़्लों को मफ़लूज कर दिया, और वे हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के मुक़द्दस रूहानी मर्तबे को न पहचान सके। बातिल की पैरवी करने और हक़ को ठुकराने की वजह से वे फ़ासिक़ और नाफ़रमान क़ौम बन गए।

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