Transliteration: (Wa innahoo la 'ilmun lis Saa'ati fa laa tamtarunna bihaa wattabi'oon; haazaa Siraatun Mustaqeem)
"और बेशक वह (ईसा) क़यामत की एक निशानी (इल्म) हैं [106], तो तुम हरगिज़ उसमें शक न करो [107] और मेरी पैरवी करो [108]; यह सीधा रास्ता है।"
यह आयत साबित करती है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का आसमान से नाज़िल होना क़यामत की एक अज़ीम और यक़ीनी निशानी है। उनका तशरीफ़ लाना इस बात की दलील होगा कि क़यामत निहायत क़रीब आ चुकी है।
फ़रमाया गया कि क़यामत के आने और हिसाब-किताब के बरपा होने में किसी को कोई शक व शुबहा नहीं होना चाहिए। यह यक़ीनी होकर रहेगा।
तमाम इंसानियत को हुक्म फ़रमाया जा रहा है कि हुज़ूर सैयदे आलम ﷺ की शरीअत और सुन्नत की पैरवी करो, क्योंकि यही दोनों जहानों में कामियाबी का सीधा रास्ता (सिरात-ए-मुस्तक़ीम) है। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम भी नाज़िल होकर हुज़ूर ﷺ ही की शरीअत की पैरवी फ़रमाएंगे।
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