कुरान - 43:61 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

61
وَإِنَّهُۥ لَعِلۡمٞ لِّلسَّاعَةِ فَلَا تَمۡتَرُنَّ بِهَا وَٱتَّبِعُونِۚ هَٰذَا صِرَٰطٞ مُّسۡتَقِيمٞ

Transliteration: (Wa innahoo la 'ilmun lis Saa'ati fa laa tamtarunna bihaa wattabi'oon; haazaa Siraatun Mustaqeem)

और बेशक वह (ईसा) क़यामत की एक निशानी (इल्म) हैं [106], तो तुम हरगिज़ उसमें शक न करो [107] और मेरी पैरवी करो [108]; यह सीधा रास्ता है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 61 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 61

"और बेशक वह (ईसा) क़यामत की एक निशानी (इल्म) हैं [106], तो तुम हरगिज़ उसमें शक न करो [107] और मेरी पैरवी करो [108]; यह सीधा रास्ता है।"

[106] हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का नुज़ूल क़यामत की अलामत

यह आयत साबित करती है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का आसमान से नाज़िल होना क़यामत की एक अज़ीम और यक़ीनी निशानी है। उनका तशरीफ़ लाना इस बात की दलील होगा कि क़यामत निहायत क़रीब आ चुकी है।

[107] क़यामत में कोई शक नहीं

फ़रमाया गया कि क़यामत के आने और हिसाब-किताब के बरपा होने में किसी को कोई शक व शुबहा नहीं होना चाहिए। यह यक़ीनी होकर रहेगा।

[108] रसूलुल्लाह ﷺ की पैरवी ही सिरात-ए-मुस्तक़ीम है

तमाम इंसानियत को हुक्म फ़रमाया जा रहा है कि हुज़ूर सैयदे आलम ﷺ की शरीअत और सुन्नत की पैरवी करो, क्योंकि यही दोनों जहानों में कामियाबी का सीधा रास्ता (सिरात-ए-मुस्तक़ीम) है। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम भी नाज़िल होकर हुज़ूर ﷺ ही की शरीअत की पैरवी फ़रमाएंगे।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now