कुरान - 43:67 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

67
ٱلۡأَخِلَّآءُ يَوۡمَئِذِۭ بَعۡضُهُمۡ لِبَعۡضٍ عَدُوٌّ إِلَّا ٱلۡمُتَّقِينَ

Transliteration: (Al akhillaaa'u Yawma'izin ba'duhum liba'din 'aduwwun illal muttaqeen (section 6))

उस दिन गहरे दोस्त भी एक दूसरे के दुश्मन बन जाएंगे [119], सिवाए परहेज़गारों (मुत्तक़ीन) के [120]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 67 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 67

"उस दिन गहरे दोस्त भी एक दूसरे के दुश्मन बन जाएंगे [119], सिवाए परहेज़गारों (मुत्तक़ीन) के [120]!"

[119] दुनियावी और गुनाह की दोस्ती दुश्मनी में तब्दील

दुनिया में जो लोग गुनाह, कुफ़्र और फ़िसक़ व फ़ुजूर पर एक दूसरे के यार-दोस्त बने हुए थे, क़यामत के दिन वे एक दूसरे पर लानत भेजेंगे और कहेंगे कि इसी ने मुझे भटकाया था। हर बातिल दोस्ती उस दिन सख़्त दुश्मनी बन जाएगी।

[120] मुत्तक़ीन और अहले-ईमान की जावेदां दोस्ती

इसके बरअक्स, जिन नेक बंदों की दोस्ती अल्लाह के लिए थी, उनकी दोस्ती आख़िरत में और ज़्यादा मज़बूत होगी। वे एक दूसरे की शफ़ाअत करेंगे और जन्नत में हमेशा साथ रहेंगे।

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