कुरान - 43:65 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

65
فَٱخۡتَلَفَ ٱلۡأَحۡزَابُ مِنۢ بَيۡنِهِمۡۖ فَوَيۡلٞ لِّلَّذِينَ ظَلَمُواْ مِنۡ عَذَابِ يَوۡمٍ أَلِيمٍ

Transliteration: (Fakhtalafal ahzaabu min bainihim fa wailun lil lazeena zalamoo min 'azaabi Yawmin aleem)

फिर उनके दरमियान के गिरोहों ने आपस में इख़्तिलाफ़ किया [115]; तो ज़ालिमों के लिए दर्दनाक दिन के अज़ाब की ख़राबी (हलाकत) है [116]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 65 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 65

"फिर उनके दरमियान के गिरोहों ने आपस में इख़्तिलाफ़ किया [115]; तो ज़ालिमों के लिए दर्दनाक दिन के अज़ाब की ख़राबी (हलाकत) है [116]!"

[115] हज़रत ईसा के बारे में मुख़्तलिफ़ गिरोहों का इख़्तिलाफ़

हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के जाने के बाद अहले-किताब आपस में फिरक़ों में बंट गए: यहूदियों ने उनकी नबुव्वत का इन्कार किया और बोहतान बांधा, जबकि ईसाईयों ने हद से तजावुज़ करके उन्हें ख़ुदा या ख़ुदा का बेटा बना डाला। सिर्फ़ सच्चा गिरोह वह था जिसने उन्हें अल्लाह का बंदा और रसूल माना।

[116] ज़ालिमों के लिए दर्दनाक अज़ाब

अल्लाह तआला ने उन तमाम गुमराह गिरोहों को दर्दनाक दिन (क़यामत) के सख्त अज़ाब की वईद सुनाई जो हक़ को छोड़कर इफ़रात व तफ़रीद में मुब्तला हुए।

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