Transliteration: (Wa la'in sa altahum man khalaqas samaawaati wal arda la yaqoolunna khalaqa hunnal 'Azeezul 'Aleem)
"और अगर आप उनसे पूछें कि: 'आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया?' तो वे यक़ीनन कहेंगे: 'उन्हें उस ज़बरदस्त (ग़ालिब), सब कुछ जानने वाले ने [11] पैदा किया।'"
यह आयत एक बुनियादी अक़ाइदी नुक्ते को वाज़ेह करती है: सिर्फ़ अल्लाह तआला के वजूद और उसकी सिफ़ात पर यक़ीन कर लेना ही सच्चा ईमान नहीं बनता, जब तक कि इसके साथ हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की नबुव्वत व रिसालत पर ईमान शामिल न हो।
अरब के मुशरिकीन यह मानते थे कि अल्लाह ही ख़ालिक़ (पैदा करने वाला) है, जैसा कि इस आयत में ज़ाहिर हुआ। वे यह तस्लीम करते थे कि वह 'अज़ीज़' (ज़बरदस्त) और 'अलीम' (सब कुछ जानने वाला) है, फिर भी वे काफ़िर ही रहे। क्यों? क्योंकि उन्होंने नबी-ए-करीम ﷺ की नबुव्वत का इन्कार किया और अल्लाह के साथ दूसरों को शरीक ठहरा कर शिर्क किया।
यह बात याद रखनी ज़रूरी है कि यह आयत दहरियों (नास्तिकों / अथिस्ट्स) के बारे में नहीं है, बल्कि उन बुत-परस्तों के बारे में है जो अल्लाह के वजूद को मानते थे, मगर अपने अक़ीदे में शिर्क और नबुव्वत के इन्कार की मिलावट किए हुए थे।
जहां तक अरब के दहरियों (अथिस्ट्स) का ताल्लुक़ है, तो वे भी मौजूद थे। वे ख़ालिक़ का सिरे से इन्कार करते थे और सिर्फ़ ज़माने और माद्दे (भौतिकवाद) को ही सब कुछ समझते थे, जैसा कि दूसरी आयत में ज़िक्र है:
"और हमें सिर्फ़ ज़माना ही हलाक करता है" (सूरह अल-जासिया 45:24)।
लिहाज़ा, यह आयत साबित करती है कि सच्चे ईमान के लिए अल्लाह पर ईमान और उसके रसूल ﷺ की रिसालत को क़बूल करना दोनों लाज़िम व मल्ज़ूम हैं, बग़ैर किसी शिर्क या इलाही पैग़ाम के इन्कार के।
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