Transliteration: (Qur-aanan 'Arabiyyan ghaira zee 'iwajil la'allahum yattaqoon)
"अरबी ज़बान का क़à¥à¤°à¤†à¤¨ [75], जिसमें कोई टेढ़ (कमी या तà¥à¤°à¥à¤Ÿà¤¿) नहीं [76], ताकि वे परहेज़गार बन जाà¤à¤‚।"
क़à¥à¤°à¤†à¤¨ मजीद को अरबी ज़बान में नाज़िल किया गया जो फ़साहत, बलाग़त और मानी के à¤à¤¤à¤¬à¤¾à¤° से दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ की सबसे मà¥à¤•मà¥à¤®à¤² और वसीअ ज़बान है। क़à¥à¤°à¤†à¤¨ का असल à¤'जाज़ उसके अरबी अलà¥à¤«à¤¼à¤¾à¤œà¤¼ और तरकीब में है। किसी तरà¥à¤œà¥à¤®à¥‡ को असल क़à¥à¤°à¤†à¤¨ नहीं कहा जा सकता, और न ही मख़ारिज की अदायगी के बग़ैर सही तिलावत मà¥à¤®à¤•िन है।
इस मà¥à¤¬à¤¾à¤°à¤• कलाम में न कोई तज़ाद है, न लफ़à¥à¤œà¤¼à¥€ या मानवी ख़ामी, और न ही हक़ीक़त से कोई इनहिराफ़। इसके तमाम अहकाम, ख़à¥à¤¶à¤–़बरियां और वईदें हक़ व इंसाफ़ पर मबà¥à¤¨à¥€ हैं। इसका मक़सद यही है कि बंदे अलà¥à¤²à¤¾à¤¹ तआला के अज़ाब से डरें और तक़à¥à¤µà¤¾ व परहेज़गारी की राह अपनाà¤à¤‚।
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