Transliteration: (Innaa anzalnaa 'alaikal Kitaaba linnaasi bilhaqq; famanih tadaa falinafsihee wa man dalla fa innamaa yadillu 'alaihaa wa maaa anta 'alaihim biwakeel (section 4))
"बेशक हमने आप पर लोगों (की हिदायत) के लिठहक़ के साथ यह किताब नाज़िल फ़रमाई [101] [102]; तो जिसने हिदायत पाई उसने अपने ही à¤à¤²à¥‡ के लिà¤, और जो गà¥à¤®à¤°à¤¾à¤¹ हà¥à¤† वह अपने ही नà¥à¤•़सान के लिठà¤à¤Ÿà¤•ा [103], और आप उन पर कोई निगहबान (ज़िमà¥à¤®à¥‡à¤¦à¤¾à¤°) नहीं हैं [104] ।"
क़à¥à¤°à¤†à¤¨ मजीद को तमाम इंसानों की हिदायत के लिठनाज़िल किया गया। हà¥à¤œà¤¼à¥‚र सलà¥à¤²à¤²à¥à¤²à¤¾à¤¹à¥ अलैहि व सलà¥à¤²à¤® तो नà¥à¤œà¤¼à¥‚ल-à¤-क़à¥à¤°à¤†à¤¨ से पहले ही हिदायत के मà¥à¤œà¤¸à¥à¤¸à¤® और सरापा नूर थे। यह किताब आपकी मारफ़त दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ को हिदायत देने के लिठअता हà¥à¤ˆà¥¤
यह किताब ब-हक़ नाज़िल हà¥à¤ˆ, यानी इसमें कोई बात बातिल नहीं। 'इनज़ाल' और 'तनà¥à¤œà¤¼à¥€à¤²'—लोह-à¤-महफ़ूज़ से आसमान-à¤-दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ पर à¤à¤• बार नाज़िल होना, और फिर तेईस (23) साल के अरसे में हज़रत जिबà¥à¤°à¥€à¤² अलैहिसà¥à¤¸à¤²à¤¾à¤® के ज़रिये बक़दà¥à¤°-à¤-ज़रूरत हà¥à¤œà¤¼à¥‚र ï·º के क़लà¥à¤¬-à¤-अतहर पर उतरना, दोनों हक़ हैं।
जो ईमान लाà¤à¤—ा वह अपना ही à¤à¤²à¤¾ करेगा और जनà¥à¤¨à¤¤ पाà¤à¤—ा, और जो इनकार करेगा वह अपना ही नà¥à¤•़सान करेगा और जहनà¥à¤¨à¤® का हक़दार बनेगा। अलà¥à¤²à¤¾à¤¹ और उसके रसूल ï·º किसी के ईमान के मोहताज नहीं हैं।
हà¥à¤œà¤¼à¥‚र सलà¥à¤²à¤²à¥à¤²à¤¾à¤¹à¥ अलैहि व सलà¥à¤²à¤® ने दावत व रिसालत का हक़ ब-दरà¥à¤œà¤¾-à¤-कमाल अदा फ़रमा दिया। आप किसी को जबरन मोमिन बनाने के ज़िमà¥à¤®à¥‡à¤¦à¤¾à¤° नहीं हैं; हिसाब लेना अलà¥à¤²à¤¾à¤¹ का काम है।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat