कुरान - 39:43 सूरह अज़-ज़ुमर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

43
أَمِ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِ ٱللَّهِ شُفَعَآءَۚ قُلۡ أَوَلَوۡ كَانُواْ لَا يَمۡلِكُونَ شَيۡـٔٗا وَلَا يَعۡقِلُونَ

Transliteration: (Amit takhazoo min doonillaahi shufa'aaa'; qul awalaw kaanoo laa yamlikoona shai'aw wa laa ya'qiloon)

क्या उन्होंने अल्लाह के सिवा कुछ सिफ़ारिशी बना रखे हैं [110]? आप फ़रमाइए: 'क्या तब भी जब वे न किसी चीज़ का इख़्तियार रखते हों और न कुछ समझते हों [111]?' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुमर आयत 43 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ुमर तफ़सीर - आयत 43

"क्या उन्होंने अल्लाह के सिवा कुछ सिफ़ारिशी बना रखे हैं [110]? आप फ़रमाइए: 'क्या तब भी जब वे न किसी चीज़ का इख़्तियार रखते हों और न कुछ समझते हों [111]?'"

[110] बातिल शफ़ीअ और सच्चे शफ़ीअ में फ़र्क़

मुशरिकों का यह गुमान था कि उनके तराशे हुए बुत अल्लाह के यहाँ उनकी शफ़ाअत करेंगे। अल्लाह तआला ने उनकी इस बातिल शफ़ाअत की तरदीद फ़रमाई।

याद रहे कि जो अल्लाह की इजाज़त के बग़ैर ज़बरदस्ती शफ़ाअत का दावा करे (जैसे मुशरिकों के बुत), वह बातिल है। लेकिन जिन्हें अल्लाह तआला ने इज़्न-ए-शफ़ाअत अता फ़रमाया—जैसे अंबिया-ए-किराम, औलिया-ए-इज़ाम और बिलख़ुसूस हुज़ूर शाफ़ेअ-ए-महशर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम—उनकी शफ़ाअत बिल्कुल हक़ और अक़ीदा-ए-अहले सुन्नत का हिस्सा है।

[111] बुतों की बेअक़्ली और बेइख़्तियारी

बुत तो बेजान पत्थर हैं, न उनके पास कोई क़ुदरत है और न ही कोई अक़्ल व समझ। ऐसे बेजान पत्थरों को अपना शफ़ीअ समझना कितनी खुली गुमराही है!

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