कुरान - 39:42 सूरह अज़-ज़ुमर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

42
ٱللَّهُ يَتَوَفَّى ٱلۡأَنفُسَ حِينَ مَوۡتِهَا وَٱلَّتِي لَمۡ تَمُتۡ فِي مَنَامِهَاۖ فَيُمۡسِكُ ٱلَّتِي قَضَىٰ عَلَيۡهَا ٱلۡمَوۡتَ وَيُرۡسِلُ ٱلۡأُخۡرَىٰٓ إِلَىٰٓ أَجَلٖ مُّسَمًّىۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتٖ لِّقَوۡمٖ يَتَفَكَّرُونَ

Transliteration: (Allaahu yatawaffal anfusa heena mawtihaa wallatee lam tamut fee manaamihaa fa yumsikul latee qadaa 'alaihal mawta wa yursilul ukhraaa ilaaa ajalim musammaa; inna fee zaalika la Aayaatil liqawmai yatafakkarroon)

अल्लाह रूहों को उनकी मौत के वक़्त क़ब्ज़ फ़रमा लेता है [105], और जिनकी मौत नहीं आई उन्हें उनकी नींद की हालत में [106]; फिर जिन पर मौत का हुक्म फ़रमा चुका है उन्हें रोक लेता है [107], और दूसरों को एक मुक़र्रर मुद्दत तक के लिए वापस भेज देता है [108]; बेशक इसमें ग़ौर करने वालों के लिए बड़ी निशानियां हैं [109] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुमर आयत 42 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ुमर तफ़सीर - आयत 42

"अल्लाह रूहों को उनकी मौत के वक़्त क़ब्ज़ फ़रमा लेता है [105], और जिनकी मौत नहीं आई उन्हें उनकी नींद की हालत में [106]; फिर जिन पर मौत का हुक्म फ़रमा चुका है उन्हें रोक लेता है [107], और दूसरों को एक मुक़र्रर मुद्दत तक के लिए वापस भेज देता है [108]; बेशक इसमें ग़ौर करने वालों के लिए बड़ी निशानियां हैं [109] ।"

[105] मौत के वक़्त रूह क़ब्ज़ होना

जब किसी इंसान की दुनियावी ज़िंदगी की मुद्दत पूरी हो जाती है, तो अल्लाह तआला मलकुल मौत हज़रत इज़राईल अलैहिस्सलाम के ज़रिये उसकी रूह को जिस्म से पूरी तरह जुदा फ़रमा लेता है।

[106] नींद में रूह का परवाज़ करना

इंसान में दो क़िस्म की रूहानी कुव्वतें मानी गई हैं—एक रूह-ए-हयात (जिससे ज़िंदगी क़ायम रहती है) और दूसरी रूह-ए-तमीज़ (जिससे शऊर व एहसास रहता है)। नींद की हालत में रूह-ए-तमीज़ का ताल्लुक़ जिस्म से ढीला हो जाता है और वह आलम-ए-बाला की सैर करती है, इसी लिए नींद को 'मौत की बहन' कहा गया है।

[107] नींद ही में मौत का वाक़े होना

जिनकी मौत का वक़्त आ पहुँचा होता है, उनकी रूह को नींद की हालत ही में रोक लिया जाता है और वे दोबारा बेदार नहीं होते बल्कि सोते ही सोते दुनिया से कूच कर जाते हैं।

[108] मुक़र्रर मुद्दत तक रूह की वापसी

जिनकी ज़िंदगी बाक़ी होती है, उनकी रूह को बेदारी के वक़्त वापस लौटा दिया जाता है ताकि वे अपनी मुक़र्ररा उम्र पूरी करें। यह रोज़ाना का सोना और जागना अल्लाह की क़ुदरत का अज़ीम मुज़ाहरा है।

[109] अक़्लमंदों के लिए इबरत व दलील

जो ज़ात रोज़ाना तुम्हें नींद के बाद दोबारा ज़िंदा (बेदार) करती है, वही ज़ात क़ियामत के दिन मौत के बाद दोबारा ज़िंदा करने पर क़ादिर-ए-मुतलक़ है।

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