कुरान - 39:46 सूरह अज़-ज़ुमर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

46
قُلِ ٱللَّهُمَّ فَاطِرَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ عَٰلِمَ ٱلۡغَيۡبِ وَٱلشَّهَٰدَةِ أَنتَ تَحۡكُمُ بَيۡنَ عِبَادِكَ فِي مَا كَانُواْ فِيهِ يَخۡتَلِفُونَ

Transliteration: (Qulil laahumma faatiras samaawaati wal ardi 'Aalimal Ghaibi washshahaadati Anta tahkumu baina 'ibaadika fee maa kaanoo feehee yakhtalifoon)

आप अर्ज़ कीजिए [116]: 'ऐ अल्लाह! आसमानों और ज़मीन के पैदा फ़रमाने वाले, छुपे और ज़ाहिर के जानने वाले! तू ही अपने बंदों के दरमियान उन बातों का फ़ैसला फ़रमाएगा जिनमें वे इख़्तिलाफ़ करते थे [117] ।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुमर आयत 46 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ुमर तफ़सीर - आयत 46

"आप अर्ज़ कीजिए [116]: 'ऐ अल्लाह! आसमानों और ज़मीन के पैदा फ़रमाने वाले, छुपे और ज़ाहिर के जानने वाले! तू ही अपने बंदों के दरमियान उन बातों का फ़ैसला फ़रमाएगा जिनमें वे इख़्तिलाफ़ करते थे [117] ।'"

[116] दुआ का नबवी अदब व तालीम

हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह दुआ तालीम फ़रमाई गई। जब बंदा अल्लाह तआला की हम्द व सना, उसकी ख़ालिक़ियत और इल्म-ए-ग़ैब व शहादत की कामिल सिफ़ात के साथ दुआ मांगता है, तो वह बारगाह-ए-इलाही में यक़ीनन मक़बूल होती है।

[117] क़ियामत के दिन इंसाफ़ का मुतलक़ फ़ैसला

हज़रत सईद इब्नुल मुसय्यब रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि जो शख़्स किसी मुश्किल के वक़्त इस आयत के ज़रिये दुआ मांगे, अल्लाह तआला उसकी दुआ ज़रूर क़बूल फ़रमाता है। बंदों के तमाम इख़्तिलाफ़ात का आख़िरी और सच्चा फ़ैसला अल्लाह तआला ही फ़रमाएगा।

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