कुरान - 39:49 सूरह अज़-ज़ुमर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

49
فَإِذَا مَسَّ ٱلۡإِنسَٰنَ ضُرّٞ دَعَانَا ثُمَّ إِذَا خَوَّلۡنَٰهُ نِعۡمَةٗ مِّنَّا قَالَ إِنَّمَآ أُوتِيتُهُۥ عَلَىٰ عِلۡمِۭۚ بَلۡ هِيَ فِتۡنَةٞ وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Fa izaa massal insaana durrun da'aanaa summa izaa khawwalnaahu ni'matam minna qaala innamaaa ootee tuhoo 'alaa 'ilm; bal hiya fitna tunw wa laakinna aksarahum laa ya'lamoon)

तो जब इंसान को कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो वह हमें पुकारता है [123]; फिर जब हम उसे अपनी तरफ़ से कोई नेमत अता फ़रमाते हैं, तो कहता है: 'यह तो मुझे अपने इल्म (हुनर) के ज़ोर पर मिला है [124]', बल्कि यह तो एक आज़माइश है, लेकिन उनमें से अक्सर नहीं जानते [125] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुमर आयत 49 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ुमर तफ़सीर - आयत 49

"तो जब इंसान को कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो वह हमें पुकारता है [123]; फिर जब हम उसे अपनी तरफ़ से कोई नेमत अता फ़रमाते हैं, तो कहता है: 'यह तो मुझे अपने इल्म (हुनर) के ज़ोर पर मिला है [124]', बल्कि यह तो एक आज़माइश है, लेकिन उनमें से अक्सर नहीं जानते [125] ।"

[123] मुसीबत में अल्लाह को याद करना

यहाँ 'इंसान' से मुराद नाशुक्रा काफ़िर या ग़ाफ़िल इंसान है। जब कोई बीमारी, फ़क़्र या तंगी आती है तो वह गिड़गिड़ा कर अल्लाह को पुकारता है और अपने बुतों को भूल जाता है।

[124] नेमत मिलने पर नाशुुक्री और तकब्बुर

मगर जैसे ही अल्लाह तआला उस पर अपनी नेमत व दौलत का दरवाज़ा खोलता है, तो वह अपनी पिछली बेबसी भूल जाता है और क़ारून की तरह घमंड से कहता है कि 'यह तो मेरी अक़्ल, तजुर्बे और हुनर का नतीजा है।' वह नेमत को अल्लाह का फ़ज़्ल मानने से इनकार कर देता है।

[125] नेमत एक इम्तिहान है

हक़ीक़त यह है कि दुनिया की दौलत और राहत इंसान के लिए एक इम्तिहान और आज़माइश है कि वह शुक्रगुज़ारी करता है या नाशुुक्री व तकब्बुर में मुब्तला होता है। मगर अक्सर नादान इस राज़ को नहीं समझते।

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