कुरान - 39:53 सूरह अज़-ज़ुमर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

53
۞قُلۡ يَٰعِبَادِيَ ٱلَّذِينَ أَسۡرَفُواْ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِمۡ لَا تَقۡنَطُواْ مِن رَّحۡمَةِ ٱللَّهِۚ إِنَّ ٱللَّهَ يَغۡفِرُ ٱلذُّنُوبَ جَمِيعًاۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلۡغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ

Transliteration: (Qul yaa'ibaadiyal lazeena asrafoo 'alaaa anfusihim laa taqnatoo mirrahmatil laah; innal laaha yaghfiruz zunooba jamee'aa; innahoo Huwal Ghafoorur Raheem)

आप फ़रमाइए: 'ऐ मेरे वे बंदो [132] [133] जिन्होंने अपनी जानों पर ज़्यादती की है [134]! अल्लाह की रहमत से ना-उम्मीद न हो [135], बेशक अल्लाह सब गुनाहों को बख़्श देता है [136]; बेशक वही बहुत बख़्शने वाला, निहायत मेहरबान है।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुमर आयत 53 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ुमर तफ़सीर - आयत 53

"आप फ़रमाइए: 'ऐ मेरे वे बंदो [132] [133] जिन्होंने अपनी जानों पर ज़्यादती की है [134]! अल्लाह की रहमत से ना-उम्मीद न हो [135], बेशक अल्लाह सब गुनाहों को बख़्श देता है [136]; बेशक वही बहुत बख़्शने वाला, निहायत मेहरबान है।'"

[132] हर मोमिन हुज़ूर ﷺ का ग़ुलाम व उम्मती

इस मुबारक आयत में हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ज़बान-ए-फ़ैज़-तर्जुमान से कहलवाया गया: 'ऐ मेरे बंदो' (या 'इबादी)। इससे साबित हुआ कि अहले ईमान हुज़ूर ﷺ के ग़ुलाम और उम्मती हैं, जैसे हदीस व उलमा की तस्रीहात में 'अब्दुन-नबी' कहलाना जाइज़ और बाइस-ए-सआदत है।

[133] उम्मत के गुनाहगारों से हुज़ूर ﷺ का ख़िताब

यह ख़िताब हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जानिब से अपनी उम्मत के उन मोमिनीन को है जो गुनाहों में मुब्तला होकर दिलशिकस्ता हो चुके थे। उन्हें तसल्ली दी गई कि मायूस न हो, तुम्हारा नबी रहमतुल लिल-आलमीन है।

[134] गुनाहगार अहले ईमान पर शफ़क़त

'जिन्होंने अपनी जानों पर ज़्यादती की' से मुराद गुनाहगार मोमिनीन हैं। अल्लाह की रहमत इतनी वसीअ है कि वह तौबा करने वालों के बड़े से बड़े गुनाह को भी माफ़ फ़रमा देता है।

[135] रहमत-ए-इलाही से ना-उम्मीदी हराम

अल्लाह की रहमत से मायूस होना कुफ़्र के क़रीब है। चाहे गुनाह समंदर के झाग और पहाड़ों जितने क्यों न हों, सिद्क़-ए-दिल से तौबा करने पर अल्लाह करीम सब माफ़ फ़रमा देता है।

[136] शान-ए-नुज़ूल—वहशी और कुफ़्फ़ार की तौबा

यह आयत उन लोगों के हक़ में नाज़िल हुई जिन्होंने ज़माना-ए-जाहिलियत में भारी गुनाह किए थे (जैसे हज़रत वहशी जिन्होंने हज़रत हमज़ा को शहीद किया था)। जब उन्होंने अर्ज़ किया कि क्या इस्लाम लाने पर हमारे पिछले गुनाह माफ़ हो जाएंगे? तो यह आयत नाज़िल हुई जिसने तमाम गुनाहगारों के लिए रहमत का अज़ीम दरवाज़ा खोल दिया।

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