कुरान - 39:54 सूरह अज़-ज़ुमर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

54
وَأَنِيبُوٓاْ إِلَىٰ رَبِّكُمۡ وَأَسۡلِمُواْ لَهُۥ مِن قَبۡلِ أَن يَأۡتِيَكُمُ ٱلۡعَذَابُ ثُمَّ لَا تُنصَرُونَ

Transliteration: (Wa aneebooo ilaa Rabbikum wa aslimoo lahoo min qabli any yaatiyakumul 'azaabu summa laa tunsaroon)

और अपने रब की तरफ़ रुजूअ लाओ [137] और उसके फ़रमांबरदार बन जाओ [138], इससे पहले कि तुम पर अज़ाब आ जाए फिर तुम्हारी कोई मदद न की जाएगी [139] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुमर आयत 54 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ुमर तफ़सीर - आयत 54

"और अपने रब की तरफ़ रुजूअ लाओ [137] और उसके फ़रमांबरदार बन जाओ [138], इससे पहले कि तुम पर अज़ाब आ जाए फिर तुम्हारी कोई मदद न की जाएगी [139] ।"

[137] रुजूअ-ए-इलाही और तौबा की ताकीद

रुजूअ लाने का मतलब है सिद्क़-ए-दिल से अल्लाह की तरफ़ पलटना और तौबा करना। काफ़िर के लिए इस्लाम लाना, गुनाहगार के लिए गुनाह छोड़ना, और नेक बंदों के लिए अपनी इबादतों को कामिल न समझकर आजीज़ी इख़्तियार करना ही रुजूअ है।

[138] मुकम्मल इताअत व फ़रमांबरदारी

अपने आपको अल्लाह के अहकाम के ताबे कर देना, नफ़्स और शैतान की पैरवी छोड़ देना, और सुन्नत-ए-रसूल ﷺ के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारना ही हक़ीक़ी इस्लाम है।

[139] अज़ाब आने से पहले तौबा की मोहलत

जब मौत का वक़्त आ जाए या अज़ाब नाज़िल हो जाए, तो फिर तौबा का दरवाज़ा बंद हो जाता है और उस वक़्त कोई मदद काम नहीं आती। इसलिए ज़िंदगी की सांसों को ग़नीमत जानकर फ़ौरन तौबा कर लेनी चाहिए।

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