कुरान - 39:56 सूरह अज़-ज़ुमर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

56
أَن تَقُولَ نَفۡسٞ يَٰحَسۡرَتَىٰ عَلَىٰ مَا فَرَّطتُ فِي جَنۢبِ ٱللَّهِ وَإِن كُنتُ لَمِنَ ٱلسَّـٰخِرِينَ

Transliteration: (An taqoola nafsuny yaahasrataa 'alaa maa farrattu fee jambil laahi wa in kuntu laminas saakhireen)

कहीं कोई जान यह न कहने लगे: 'हाय अफ़सोस मेरी उस कोताही पर जो मैंने अल्लाह के हक़ में की [142], और बेशक मैं तो मज़ाक़ ही उड़ाता रहा [143]!' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुमर आयत 56 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ुमर तफ़सीर - आयत 56

"कहीं कोई जान यह न कहने लगे: 'हाय अफ़सोस मेरी उस कोताही पर जो मैंने अल्लाह के हक़ में की [142], और बेशक मैं तो मज़ाक़ ही उड़ाता रहा [143]!'"

[142] अल्लाह और रसूल के हुक़ूक़ में कोताही पर हसरत

क़ियामत के दिन काफ़िर और ग़ाफ़िल इंसान अपनी बेअमली पर अफ़सोस करेगा कि उसने अल्लाह की फ़रमांबरदारी और हुज़ूर ﷺ के अदब व इताअत में सख़्त कोताही की। रसूल ﷺ की नाफ़रमानी दरहक़ीक़त अल्लाह ही की नाफ़रमानी है।

[143] दीन का मज़ाक़ उड़ाने का अंजाम

दुनिया में जो लोग नमाज़, रोज़ा, शरीअत और इस्लामी अहकाम का मज़ाक़ उड़ाते थे और मोमिनीन पर हँसते थे, वे उस दिन अपनी इस बेहुदा हरकत पर ख़ून के आँसू रोएंगे।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now