Transliteration: (In takfuroo fa innal laaha ghaniyyun 'ankum; wa laa yardaa li'ibaadihil kufra wa in tashkuroo yardahu lakum; wa laa taziru waaziratunw wizra ukhraa; summa ilaa Rabikum marji'ukum fa-yunabbi'ukum bimaa kuntum ta'maloon; innahoo 'aleemum bizaatissudoor)
"अगर तुम ना-शुक्री (कुफ़्र) करोगे तो बेशक अल्लाह तुमसे बे-परवाह है [24], और वह अपने बंदों के लिए कुफ़्र पसंद नहीं फ़रमाता [25]; और अगर तुम शुक्र अदा करोगे [26] तो वह इसे तुम्हारे लिए पसंद फ़रमाता है; और कोई बोझ उठाने वाली जान किसी दूसरी जान का बोझ नहीं उठाएगी [27]; फिर तुम्हारे रब ही की तरफ़ तुम्हारा लौटना है, फिर वह तुम्हें बता देगा जो कुछ तुम किया करते थे; बेशक वह सीनों के भेदों को ख़ूब जानने वाला है।"
बंदे की इबादत से अल्लाह की सल्तनत में इज़ाफ़ा नहीं होता और न कुफ़्र से कोई कमी आती है; वह अल-ग़नी और बे-नियाज़ है।
अगरचे कुफ़्र इंसान के अपने इरादे से होता है, मगर अल्लाह अपने बंदों के लिए कुफ़्र और ना-शुक्री को कभी पसंद नहीं फ़रमाता।
ईमान और शुक्रगुज़ारी अल्लाह को महबूब है और इसका अज्र बंदे ही को मिलता है।
क़ियामत के दिन कोई किसी के गुनाहों का बोझ अपनी मर्ज़ी से नहीं उठाएगा; हाँ, गुमराह करने वाले अपने गुनाहों के साथ-साथ अपने पैरवकारों के गुनाहों का वबाल भी भुगतेंगे (सूरह अल-अंकबूत: 13)।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat