Transliteration: (Wa izaa massal insaana durrun da'aa Rabbahoo muneeban ilaihi summa izaa khawwalahoo ni'matam minhu nasiya maa kaana yad'ooo ilaihi min qablu wa ja'ala lillaahi andaadal liyudilla 'ansabeelih; qul tamatta' bikufrika qaleelan innaka min Ashaabin Naar;)
"और जब इंसान को कोई तकलीफ़ पहुँचती है [28], तो वह अपने रब को उसी की तरफ़ रुजूअ करते हुए पुकारता है; फिर जब वह उसे अपनी तरफ़ से कोई नेअमत अता फ़रमा देता है, तो वह उस दुआ को भूल जाता है जो उसने पहले की थी [29], और अल्लाह के लिए शरीक ठहराने लगता है [30] ताकि (लोगों को) उसकी राह से भटकाए; आप फ़रमा दीजिए: अपने कुफ़्र का थोड़ा सा फ़ायदा उठा ले [31], बेशक तू दोज़ख़ वालों में से है!"
यहाँ "इंसान" से मुराद अबू जहल और मुशरिकीन हैं जो बीमारी या मुसीबत में तो अल्लाह को पुकारते थे।
तकलीफ़ दूर होते ही इंसान अपनी आजिज़ी और दुआओं को भूल जाता है, जो कमज़ोर ईमान की अलामत है। सच्चा मोमिन राहत में भी शुक्रगुज़ार रहता है।
राहत मिलने के बाद मुशरिक लोग बुतों को शरीक ठहराने लगते हैं। यह आयत काफ़िरों के बारे में है, इसे औलिया-ए-किराम पर चस्पाँ करना ख़ारिजियों का तरीक़ा है।
काफ़िरों की दुनियावी ऐश आरज़ी है और उनका अंजाम दायमी दोज़ख़ की आग है।
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