Transliteration: (Amman huwa qaanitun aanaaa'al laili saajidanw wa qaaa'imai yahzarul Aakhirata wa yarjoo rahmata Rabbih; qul hal yastawil lazeena ya'lamoona wallazeena laa ya'lamoon; innamaa yatazakkaru ulul albaab (section 1))
"भला वह शख़्स जो रात की घड़ियों में इबादत करने वाला है [32], सजदे और क़ियाम की हालत में, आख़िरत से डरता है और अपने रब की रहमत की उम्मीद रखता है (क्या वह नाफ़रमान जैसा हो सकता है?) आप फ़रमा दीजिए: क्या इल्म वाले और बे-इल्म बराबर हो सकते हैं [33]? बेशक नसीहत तो सिर्फ़ अक़्ल वाले ही क़बूल करते हैं [34]!"
यह आयत मुबारका हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़, हज़रत उमर फ़ारूक़ और हज़रत उस्मान ग़नी (रदियल्लाहु अन्हुम) की शान में नाज़िल हुई जो रात के सन्नाटे में तहज्जुद, क़ियाम और सुजूद में रो-रो कर अल्लाह की इबादत फ़रमाते थे।
दीनी इल्म रखने वाला आलिम सिर्फ़ इबादत करने वाले आबिद से कहीं बुलंद दर्जा रखता है। हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) को इल्म ही की बिना पर फ़रिश्तों पर फ़ज़ीलत मिली। हज़रत आइशा सिद्दीक़ा (रदियल्लाहु अन्हा) अपने इल्मे दीन के सबब तमाम औरतों पर मुमताज़ हैं।
हक़ीक़ी अक़्लमंद वही है जो नबी की हिदायत को समझे और उस पर अमल करे।
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