कुरान - 35:12 सूरह फातिर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

12
وَمَا يَسۡتَوِي ٱلۡبَحۡرَانِ هَٰذَا عَذۡبٞ فُرَاتٞ سَآئِغٞ شَرَابُهُۥ وَهَٰذَا مِلۡحٌ أُجَاجٞۖ وَمِن كُلّٖ تَأۡكُلُونَ لَحۡمٗا طَرِيّٗا وَتَسۡتَخۡرِجُونَ حِلۡيَةٗ تَلۡبَسُونَهَاۖ وَتَرَى ٱلۡفُلۡكَ فِيهِ مَوَاخِرَ لِتَبۡتَغُواْ مِن فَضۡلِهِۦ وَلَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ

Transliteration: (Wa maa yastawil bahraani haaza 'azbun furaatun saaa'ighun sharaabuhoo wa haazaa milhun ujaaj; wa min kullin ta'kuloona lahman tariyyanw wa tastakhrijoona hilyatan talbasoonahaa wa taral fulka feehi mawaakhira litabtaghoo min fadlihee wa la'allakum tashkuroon)

और दोनों समुंदर एक जैसे नहीं होते [40]; यह एक मीठा, प्यास बुझाने वाला, पीने में ख़ुशगवार है [41], और यह दूसरा खारा, कड़वा है [42]; और तुम हर एक में से ताज़ा गोश्त (मछली) खाते हो और ज़ेवर (मोती-मूंगा) निकालते हो जिसे तुम पहनते हो [43]; और आप उसमें कश्तियों को देखते हैं जो पानी को चीरती हुई चलती हैं [44] ताकि तुम उसका फ़ज़्ल तलाश करो [45] और ताकि तुम शुक्र अदा करो। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फातिर आयत 12 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ातिर तफ़सीर - आयत 12

"और दोनों समुंदर एक जैसे नहीं होते [40]; यह एक मीठा, प्यास बुझाने वाला, पीने में ख़ुशगवार है [41], और यह दूसरा खारा, कड़वा है [42]; और तुम हर एक में से ताज़ा गोश्त खाते हो और ज़ेवर निकालते हो जिसे तुम पहनते हो [43]; और आप उसमें कश्तियों को देखते हैं जो पानी को चीरती हुई चलती हैं [44] ताकि तुम उसका फ़ज़्ल तलाश करो [45] और ताकि तुम शुक्र अदा करो।"

[40] ज़ायके और फ़ायदे का फ़र्क़

मीठे और खारे समुंदर ज़ाहिरी शक्ल में पानी होने के बावजूद ज़ायके और तासीर में बराबर नहीं हैं। हर एक की अपनी ख़ुसूसियत और हिकमत है।

[41] इंसानी दर्जात की रूहानी मिसाल

जिस तरह दोनों दरिया बराबर नहीं हो सकते, उसी तरह मोमिन और काफ़िर बराबर नहीं हो सकते। जब दो पानी बराबर नहीं, तो आम इंसान और अंबिया-ए-किराम कैसे बराबर हो सकते हैं! अंबिया की ज़ात मख़्लूक़ में बे-मिसाल और मुक़द्दस है।

[42] ताज़ा गोश्त (मछली) का हुक्म

मछली को ताज़ा गोश्त फ़रमाया गया क्योंकि यह जल्दी ख़राब होती है। फ़िक़्ही मस्अला: अगर किसी ने गोश्त न खाने की क़सम खाई और मछली खा ली तो क़सम नहीं टूटेगी, क्योंकि क़ुरआन का लफ़्ज़ आम है और फ़िक़्ह का उसूल मुअय्यन है।

[43] समुंदर के ज़ेवरात और मर्दों के लिए मोती का हुक्म

समुंदर से मोती व मूंगा निकलते हैं। औरतें ज़ेवर पहनती हैं और मर्द उनके हुस्न से महज़ूज़ होते हैं। मर्दों के लिए मोती पहनना जायज़ है, जबकि सोना व चांदी हराम है (तफ़सील फ़तावा-ए-नईमी में मुलाहिज़ा हो)।

[44] कश्तियों का पानी चीर कर तैरना

भारी-भरकम जहाज़ों का हल्के पानी पर न डूबना और मौजों को चीरते हुए चलना अल्लाह तआला की क़ुदरत और बुज़ुर्गी की निशानी है।

[45] दुनियावी व दीनी फ़ज़्ल की तलाश

सफ़र और तिजारत से हलाल रिज़्क़ कमाना और इसी तरह हज, ज़ियाराते औलिया और दीनी सफ़र करना सब अल्लाह के फ़ज़्ल की तलाश में शामिल है।

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